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सरदार पटेल ने सत्तर साल पहले चेता दिया था

चीन की कुदृष्टि असम के महत्वपूर्ण हिस्सों पर है
पिछले दिनों चीन ने भारत को यह कह कर धमकाया, कि 1962 की हार को भारत को याद रखना चाहिये। वास्तव में चीनी अजगर को भी भारत ने ही पाला-पोसा है। हमने ‘पंचशील’ का आत्मघाती सिद्धान्त दिया और चीन को तिब्बत पर अधिकार करने दिया। उस समय भी सरदार वल्लभ भाई पटेल चीन की वास्तविकता जानते समझते थे। 7 नवम्बर 1950 को उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को एक पत्र लिख कर चीन के मंसूबों के बारे में चेतावनी दी थी। वह पत्र प्रस्तुत है-
मेरे प्रिय जवाहरलाल,
चीन सरकार ने हमें अपने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के आडंबर में उलझाने का प्रयास किया है। मेरा यह मानना है कि वे हमारे राजदूत के मन में यह झूठा विश्‍वास कायम करने में सफल रहे कि चीन तिब्बत की समस्या को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना चाहता है। चीन की अंतिम चाल, मेरे विचार से कपट और विश्‍वासघात जैसी ही है।
पिछले कई महीनों से रूसी गुट से परे हम ही केवल अकेले थे, जिन्होंने चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिलवाने की कोशिश की तथा फारमोसा के प्रश्‍न पर अमरीका से कुछ न करने का आश्‍वासन भी लिया। मुझे इसमें संदेह है कि चीन को अपनी सदिच्छाओं, मैत्रीपूर्ण उद्देश्यों और निष्कपट भावनाओं के बारे में बताने के लिए हम जितना कुछ कर चुके हैं, उसमें आगे भी कुछ किया जा सकता है। हमें भेजा गया उनका अंतिम टेलिग्राम की भाषा साफ बताती है, कि यह किसी दोस्त की नहीं बल्कि भावी शत्रु की भाषा है। चीन की कुदृष्टि हमारी तरफ वाले हिमालयी इलाकों तक ही सीमित नहीं है, वह असम के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों पर भी नजर गड़ाए हुए है। बर्मा पर भी उसकी नजर है। मेरे विचार से हमारे मन में यह स्पष्ट धारणा होनी चाहिए कि हमें क्या प्राप्त करना है और किन साधनों से प्राप्त करना है।
इन खतरों के अलावा हमें गंभीर आतंरिक संकटों का भी सामना करना पड़ सकता है। मैंने (एचवीआर) आयंगर को पहले ही कह दिया है कि वह इन मामलों की गुप्तचर रिपोर्टों की एक प्रति विदेश मंत्रालय को भेज दें। कुछ समस्याओं का उल्लेख कर रहा हूँ जिनका मेरे विचार में तत्काल समाधान करना होगा और
जिन्हें दृष्टिगत रखते हुए ही हमें अपनी प्रशासनिक या सैन्य नीतियां
बनानी होंगी तथा उन्हें लागू करने का उपाय करना होगा।
आपका,
वल्लभ भाई पटेल

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