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वामपंथ का तात्पर्य क्या हिन्दू विरोध है? जेएनयू में फिर लगे आपत्तिजनक नारे

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वामपंथी दावा करते रहे हैं कि वे समाज में आर्थिक समानता और सेक्युलरिज्म (पंथ निरपेक्षता) के समर्थक हैं। परन्तु उनकी यह पंथ (धर्म)निरपेक्षता ‘हिन्दू विरोध’ के रूप में ही प्रकट होती है।
देश राममंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद से आगे बढ़ गया है। सबसे बड़े न्यायालय द्वारा राम मंदिर के पक्ष में दिए निर्णय को देश ने सहजता से स्वीकार कर लिया है। मस्जिद निर्माण के लिए भी अलग से 5 बीघा भूमि दे दी गई है। अब वहाँ भव्य-दिव्य राम मंदिर बन रहा है, ऐसी स्थिति में वहाँ फिर से ‘बाबरी मस्जिद’ बनाने का बेसुरा राग वामपंथी क्यों अलाप रहे हैं?
जेएनयू (जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी) में 6 दिसम्बर को वाम छात्र संगठन के छात्रों ने बाबरी मस्जिद के समर्थन में प्रदर्शन कर उसे फिर से बनाने की मांग की।
उस दिन रात 8.30 बजे वाम छात्रों ने जुलूस निकाला। छात्रसंघ के उपाध्यक्ष साकेत मून ने भाषण दिया कि वहां फिर से मस्जिद बनानी चाहिए। नारे लगाए गए ‘नहीं सहेंगे हाशिमपुरा, नहीं करेंगे दादरी, फिर बनाओ, फिर बनाओ बाबरी’ हाशिमपुरा और दादरी में साम्प्रदायिक घटनाएं हुई थीं। वामपंथियों को केवल वही दिखाई देती हैं।
अब देश साम्प्रदायिक दंगों से धीरे-धीरे मुक्त होता जा रहा है। गंगा-यमुना में इन घटनाओं के बाद बहुत पानी बह गया है। वामपंथी क्यों फिर से देश में साम्प्रदायिकता की आग सुलगाने में लगे हैं। देश अभी तक नहीं भूला है जब जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग ने नारे लगाए थे- “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह” तथा आतंकी अफजल के समर्थन में- “ अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा है।”
देश की जनता को इन लोगों का चरित्र अब समझ में आने लगा है।

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