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लंदन की लूसी अब काशी में वेदों की शिक्षा देती हैं

काशी के केदार घाट पर जब आप प्रातः काल जायेंगे तो आपको बालकों का एक समूह वेदों का मधुर स्वरों में पाठ करता दिखाई देगा। उन्हीं के साथ बालकों के उच्चारण ठीक कराती एक यूरोपीय महिला भी दिखेंगी। सफेद वस्त्र पहने और माथे पर चन्दन का तिलक लगाये यह गोरी चिट्टी महिला किसी देवी के अवतार जैसी दिखाई देती है। यह देवी सरीखी महिला लंदन की एच.लूसी है जो भारत आकर तथा अपने गुरु से दीक्षा लेकर दिव्यप्रभा हो गई है।
साध्वी दिव्यप्रभा ने ऑक्सफोर्ड विश्‍वविद्यालय से इंजीनियरिंग की डिग्री ली और एक अमरीकी बैंक में अधिकारी हो गईं। परिवार पहले से ही सम्पन्न था। उसमें लूसी की सम्पन्नता और जुड़ गई। इस सम्पन्नता के बाद भी लूसी के मन में शांति नहीं थी। उन्हें अपने जीवन का उद्देश्य समझ में नहीं आ रहा था। उन्हीं दिनों उनकी भेंट लंदन में आये विश्‍वात्मा बावरा जी महाराज से हुई। उनसे बात करने के बाद उन्हें बड़ी शांति मिली। इसके बाद वे हरिद्वार में बावरा जी महाराज के आश्रम में आने लगीं। बीस साल पहले महाराज ने उन्हें दीक्षा दी और वे लूसी से दिव्यप्रभा हो गईं। अब वे हरिद्वार में बावरा जी के आश्रम में रह कर संस्कृत सीखने लगीं। वर्ष 2006 में वे संस्कृत के विशेष अध्ययन के लिये काशी आ गईं।
अब गुरुजी ने साध्वी दिव्यप्रभा को काशी में ही रह कर बालकों को संस्कृत की शिक्षा देने के लिये कहा। इसके लिए लगभग पाँच वर्ष पहले साध्वी नें ‘इंटरनेशनल चन्द्रमौलि चैरिटेबल ट्रस्ट’ की स्थापना की। इसी के साथ बाबा विश्‍वनाथ के पास लाहोरी टोला में बच्चों को संस्कृत की शिक्षा देने का काम शुरु हुआ। इस समय चालीस बालक यहाँ प्राचीन गुरुकुल पद्धति से वेदों का अध्ययन कर रहे हैं। इनके अतिरिक्त प्रतिदिन ढाई सौ बालक यहाँ प्रातः और सायंकाल अंग्रेजी, संस्कृत, वेद व कम्प्यूटर की शिक्षा लेने आते हैं। सभी बच्चों को योग और प्राणायाम की शिक्षा दी जाती है। साध्वी दिव्यप्रभा के अतिरिक्त बीस अन्य आचार्य बालकों की शिक्षा के लिये आते हैं। साध्वी स्वयं संस्कृत का व्याकरण पढ़ाती हैं। अब उन्हें काशी और गंगा से इतना प्रेम हो गया है कि उनका मन और कहीं लगता ही नहीं है।
वे बड़े गर्व से कहती हैं कि भारत की संस्कृति अतुल्य है। उनका कहना है-“ पैसा होना कोई सुख का साधन नहीं है। सुख का साधन अपनी संस्कृति और परम्परा का ज्ञान है, जो चित्त को शांत करता है।”

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