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यह बाण-स्तम्भ दक्षिणी धुव्र की दिशा बताता है

बारह ज्योतिर्लिंगों में एक ऐतिहासिक सोमनाथ अपने आप में ही एक अनोखा स्थान है। यह पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मन्दिर हमलावरों ने कई बार ध्वस्त किया और यह फिर उसी वैभव के साथ उठ खड़ा हुआ। अंतिम बार इसका जीर्णोद्वार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरदार पटेल के प्रयत्नों से हुआ। तब भारत के पहले राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा के समय उपस्थित थे।
इस विशाल मन्दिर के परिसर में एक बाण-स्तम्भ है जो कम से कम ढाई हजार वर्ष पुराना माना जाता है। इस स्तम्भ के ऊपर गोल पृथ्वी स्थित है जिसके बीच में तीर निकला हुआ है। आश्‍चर्य की बात है कि यह बाण पृथ्वी के दक्षिणी धु्रव की दिशा की ओर है। बाण-स्तम्भ पर संस्कृत में लिखा है कि इस बिन्दु से सीधे चलने पर दक्षिणी धुव्र आ जायेगा तथा पूरे रास्ते में कोई अवरोध नहीं आयेगा। अवरोध का अर्थ है कि तीर की दिशा में सीधे चलते रहने पर मार्ग में कोई भूखण्ड नहीं आयेगा। इस अद्भुत स्तम्भ पर जो लिखा है कि वह पूरी तरह सही है। बाण की दिशा में चलते रहने पर समुद्र पार दक्षिणी धुव्र ही आयेगा। इससे कुछ बातों का पता चलता है-
* ढाई हजार साल पहले भारत के लोगों को पता था कि पृथ्वी गोल है।
* भारतीय वैज्ञानिक उत्तरी और दक्षिणी धुव्र के बारे में न केवल जानते थे, बल्कि उनकी स्थिति से भी अवगत थे।
* हमारे विद्वानों को यह भी पता था कि किस दिशा में क्या आता है। इसका अर्थ है कि पूरी पृथ्वी का मानचित्र ढाई हजार साल पहले भारत के वैज्ञानिकों ने बना लिया था।
यह बाण-स्तम्भ समुद्र के तट पर है। अब प्रश्‍न यह उठता है कि क्या प्रथम ज्योतिर्लिंग दक्षिणी धु्रव की सीध में योजनाबद्ध रूप से मनाया गया था? लगता तो यही है।

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