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मातृभूमि के विभाजन की वेदना विभाजन निरस्त होने पर ही मिटेगी - डॉ. मोहन भागवत

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“मातृभूमि का विभाजन न मिटने वाली वेदना है और यह वेदना तभी मिटेगी, जब विभाजन निरस्त होगा। इतिहास सभी को जानना चाहिए। पूर्व में हुईं गलतियों से दुखी होने की नहीं, अपितु सबक लेने की आवश्यकता है। गलतियों को छिपाने से उनसे मुक्ति नहीं मिलेगी। विभाजन से न तो भारत सुखी है और न वे सुखी हैं, जिन्होंने इस्लाम के नाम पर विभाजन किया।”
उक्त उद्गार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 25 नवम्बर को नोएडा स्थित भाऊराव देवरस सरस्वती विद्या मंदिर में आयोजित श्री कृष्णानन्द सागर की ‘विभाजनकालीन भारत के साक्षी’ पुस्तक के विमोचन अवसर पर व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि इसे तब से समझना होगा, जब भारत पर इस्लाम का आक्रमण हुआ और गुरु नानक देव जी ने सावधान करते हुए कहा था - “यह आक्रमण देश और समाज पर है, किसी एक पूजा पद्धति पर नहीं।”
देश की स्वतन्त्रता को लेकर संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार की दूरदर्शिता के विषय में बताते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 1930 में डॉ. हेडगेवार ने सावधान करते हुए हिन्दू समाज को संगठित होने को कहा था। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा, भीष्म पितामह ने कहा था कि विभाजन कोई समाधान नहीं है, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा कि रणछोड़ कर मत भागो। परन्तु हमारे नेता मैदान छोड़कर भाग गए। मुट्ठी भर लोगों को संतुष्ट करने के लिए हमने कई समझौते किए। राष्ट्रगान से कुछ पंक्तियां हटाईं, राष्ट्रीय ध्वज के रंगों में परिवर्तन किया, परन्तु वे मुट्ठी भर लोग फिर भी संतुष्ट नहीं हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यह आकांक्षा रखना कि हंस के लिया है पाकिस्तान, लड़कर लेंगे हिन्दुस्तान, तो आपको क्या लगता है, पता नहीं। मैं सारे देश में घूमता हूँ, मैं आपको बता सकता हूँ ... यह 2021 है, 1947 नहीं है। भारत का विभाजन एक बार संभव हुआ। एक बहुत बड़ी ठोकर समाज ने खाई। लहूलुहान हो गया, पीड़ा से कुलबुला उठा। लेकिन अब इस बात को भूलेगा नहीं, और इसलिए भारत का और विभाजन अब संभव नहीं। कोई करने का प्रयास करेगा तो उसके टुकड़े होंगे।

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