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महादेव मन्दिर जो नौ महीने लुप्त रहता है

अपने देश में भगवान शिव शंकर का एक ऐसा मन्दिर भी है जो साल में नौ महीने लुप्त रहता है और अप्रेल, मई,जून माह में ही दिखाई देता है। यह मन्दिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में है, स्थानीय बोली में जिसका नाम ‘बाथू की लड़ी’ है।
मान्यता है कि यह मन्दिर पाण्डवों ने अपने वनवास काल में बनवाया था। मन्दिर में पाण्डवों ने विशाल शिवलिंग स्थापित किया जिस पर डूबते सूर्य की किरणें पड़ती थीं। पाण्डवों ने यह मन्दिर एक रात में बनाया। योगेश्‍वर श्रीकृष्ण की कृपा से वह एक रात छह महीने की हो गई और इसीलिये माना जाता है कि यह मन्दिर श्रीकृष्ण की शक्तियों से बँधा हुआ है। मन्दिर के बाहर पाण्डवों ने स्वर्ग जाने के लिये सीढ़ियाँ भी बनवाईं थी। ये सीढ़ियाँ एक मीनार जैसे भवन में बनी हैं। इस मीनार में इस समय गोलाकार सौ सीढ़ियाँ हैं।
इस ऐतिहासिक मन्दिर पर इस्लामी हमलावरों का आक्रमण भी हुआ। वे इसे ध्वस्त नहीं कर पाये तो शिवलिंग पर पड़ने वाली सूर्य किरणों को रोकने की कोशिश उन्होंने की। इसके लिए उन्होंने मन्दिर के सामने कई गुम्बद बना दिये।
1970 में पोंग बांध बनने पर यह मन्दिर बांध के जलाशय के क्षेत्र में आ गया और डूब गया। श्रद्धालुओं ने इसके पहले पाण्डवों के स्थापित किये शिवलिंग को वहाँ से हटा लिया। अब जब अप्रेल में जलाशय में पानी कम हो जाता है तो मन्दिर प्रकट हो जाता है और तीन महीनों तक यहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। तीन महीनों के लिये जब महादेव मन्दिर प्रकट होने लगा तो वहाँ एक छोटे शिवलिंग की स्थापना कर दी गई।
इस मन्दिर की आश्‍चर्यजनक बात यह है कि लगभग पचास वर्षों से यह साल में नौ महीने पानी में डूबा रहता है फिर भी ये कहीं से भी खण्डित नहीं हुआ है। इतने लम्बे समय तक पानी में रहने के बाद भी इस पर ‘काई’ कहीं नहीं जमती। दस-पन्द्रह दिनों में ही पानी में डूबी वस्तु पर काई जमने लगती हैं, पर इस बाथू की लड़ी के भीतर-बाहर कहीं कोई काई नहीं लगती। जुलाई से मार्च के नौ महीनों में मन्दिर की स्वर्ग की सीढ़ियों की केवल छत पानी से बाहर दिखाई देती है।
भीम की गुलेल- बाथू की लड़ी से तीन कि.मी. की दूरी पर एक काला पत्थर रखा है। इसकी भी श्रद्धा से पूजा की जाती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि मन्दिर निर्माण में बाधा उत्पन्न करने वाले राक्षसों को भगाने के लिये भीम ने अपने गुलेल से उन पर पत्थर फैंके थे। उन पत्थरों में से ही यह पत्थर तीन कि.मी. की दूरी पर गिरा। पहले यह खुले में था, अब इस पर छत डाल कर पूजा स्थल का रूप दे दिया गया है। देखने से लगता है कि पत्थर किसी उल्का-पिण्ड का टुकड़ा रहा होगा। पृथ्वी पर गिरने के साथ यह तनिक भीतर धँस गया।
यह मन्दिर भी भारत की उत्कृष्ट भवन निर्माण कला का एक उदाहरण है।

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