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मरुभूमि के कुम्भ में लाखों श्रद्धालु आये

गांधार (आज का अफगानिस्तान) से कन्याकुमारी तथा कच्छ से कामरूप (असम) तक फैले अपने इस राष्ट्र में एकात्मता बनाये रखने के लिये कुम्भ मेलों की परम्परा शुरु की गई। नासिक, हरिद्वार, प्रयाग तथा महाकालेश्‍वर की नगरी उज्जैन में बारह वर्षों में एक बार महाकुम्भ का आयोजन होता है। इनमें सम्पूर्ण देश-वासी सहभागी हो एकात्मता का अनुभव करते हैं और सामाजिक समरसता का भाव उत्पन्न करते हैं। ऐसे कुम्भ मेले उक्त चार तीर्थ स्थलों के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में भी लगते हैं। राजस्थान में वनवासी बन्धुओं का महाकुम्भ बेणेश्‍वर धाम (बाँसवाड़ा) में होता है। इसी प्रकार बाड़मेर जिले के चौहटन के पास सुईंया में भी मरुभूमि का कुंभ आयोजित होता है। यह भी बारह सालों में एक बार होता है। पौष माह की चतुर्दशी तथा अमावस्या को ज्येष्ठा नक्षत्र में यह सुईंया पोषण मेला लगता है।
इस बार भी 17 तथा 18 दिसम्बर को बीस लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने पवित्र सरोवर में स्नान किया। स्नान के लिये तीन सौ नल भी लगाये गये थे जिनमें सरोवर का जल आ रहा था। तीर्थ यात्रियों ने स्नान के बाद सुईंया, कपालेश्‍वर, डूंगरपुरी मठ, इन्द्रभण तालाब, धर्मराज मन्दिर तथा विष्णु पगलिया मन्दिर सहित कई मन्दिरों व धर्म-स्थानों के दर्शन किये। मान्यता है कि वनवास के काल में पाण्डव कुछ समय के लिये यहाँ भी ठहरे थे।

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