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बारा बस्सी के पठान गाय और गंगा की पूजा करते हैं

उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले की स्याना तहसील में गंगा के किनारे बारह गाँव हैं जिनमें पठान रहते हैं। इसी कारण इस क्षेत्र का नाम बारा बस्सी पड़ गया। यहाँ के पठान आज भी गाय और गंगा पर पूरी श्रद्धा रखते हैं और इनकी पूजा करते हैं। इन गाँवों के अधिकतर पठान परिवारों ने गोशालाएं बना रखी हैं। जिनमें बूढ़ी और बीमार गायों की भी सेवा की जाती है। बारा-बस्सी के गाँवों में एक चन्दियाना भी है। यहाँ के बब्बन मियाँ गोपालन के साथ एक डेयरी भी चलाते हैं जिसमें देशी गायों का शुद्ध दूध मिलता है।
बब्बन मियाँ का पूरा नाम जुबेदुर्रहमान है। उनकी गोशाला का नाम भी श्रीकृष्ण के ऊपर मधुसूदन गोशाला रखा गया है। पांचजन्य साप्ता.(18 जून) में प्रकाशित एक रपट के अनुसार बब्बन मियाँ गरीब व जरूरतमंदों को अपनी डेयरी का दूध निःशुल्क ही देते हैं।
भारत के इतिहास के अनुसार बारा बस्सी के पठानों ने पहले शेरशाह सूरी और बाद में हेमू की सहायता की थी। हेमू ने बाद में अकबर को हराया और हेमचन्द्र विक्रमादित्य के नाम से दिल्ली का सम्राट बना। पठानों ने हेमचन्द्र की भरपूर सहायता की थी। हेमू की पराजय के बाद बारा बस्सी के पठान मेवाड़ चले गये और महाराणा की सेना में भर्ती हो गये। उनमें से एक योद्धा हकीम खाँ सूर प्रताप का सेना नायक था, जिसने हल्दीघाटी के युद्ध में वीरगति पाई।

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