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प्राचीनकाल के विश्‍व प्रसिद्ध पशु - चिकित्सक शालिहोत्र

भारत के प्राचीन चिकित्सा विज्ञानियों में शालिहोत्र का नाम भी खासा जाना-पहचाना है। शालिहोत्र की खासियत यह थी कि वे अपने समय के जाने-माने पशु-चिकित्सक थे। खासकर घोड़ों और उनके रोगों के बारे में उनकी जानकारी इतनी विलक्षण और संपूर्ण है कि आज भी दुनिया भर में शालिहोत्र के ग्रंथ का बड़े सम्मान से उल्लेख किया जाता है। यह बात आज विचित्र लग सकती है पर सच यह है कि आज की तुलना में प्राचीन काल में पशुओं की चिकित्सा के बारे में हमारी जानकारी कहीं अधिक विकसित थी। शायद इसीलिए ही घोड़े-हाथी हों या दूसरे पशु वे मनुष्य के लिये उपयोगी तो थे ही, साथ ही मनुष्य का उनके साथ एक किस्म का रागात्मक संबंध भी था। आज मशीनी युग में यह संबंध बिगड़ गया है।
शालिहोत्र के जीवन के बारे में आज हमारे पास अधिक जानकारी नहीं है। कहा जाता है कि वे एक ब्राह्मण मुनि हयघोष के पुत्र थे और श्रावस्ती में रहते थे। वे सुश्रुत और अग्निवेश के समकालीन कहे जाते हैं। इस लिहाज से शालिहोत्र ईसा-पूर्व आठवीं शताब्दी में यानी आज से कोई 2800 वर्ष पूर्व हुए। शालिहोत्र का घोड़ों के संबंध में ज्ञान इतना अपूर्व था कि दूर-दूर तक उनकी ख्याति फैल गई थी। घोड़ों के रोगों और उन्हें स्वस्थ रखने के तौर-तरीकों का विस्तृत वर्णन उन्होंने अपनी cialisfrance24.com पुस्तक ‘हय आयुर्वेद’ में किया है। इस पुस्तक की इतनी ख्याति हुई कि देखते शालिहोत्र का नाम भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक छा गया। यहां तक कि विदेशों में भी उनका नाम और कीर्ति पहुँची।
उनके ग्रंथ ‘हय आयुर्वेद’ को ‘तरंग्म शास्त्र’ या ‘शालिहोत्र संहिता’ भी कहा जाता है। इस विशाल ग्रंथ में 1200 श्‍लोक हैं जिनमें घोड़ों की जाति-प्रजातियां, नस्ल, उम्र आदि का वर्णन है तथा घोड़ों को स्वस्थ बनाने तथा बेलगाम घोड़ों को साधने के तौर-तरीकों के बारे में रोचक ढ़ंग से बताया गया है। घोड़ा खरीदते समय क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए तथा किन-किन चीजों का खास ध्यान रखना चाहिए, इसके बारे में भी शालिहोत्र एक अनुभवी पथ-प्रदर्शक की तरह हमें काम की बातें बताते चलते हैं। इस लिहाज से शालिहोत्र का ग्रंथ ‘हय आयुर्वेद’ भारतीय संस्कृति और चिकित्सा-जगत में एक अलग स्थान रखता है। भारत में वैज्ञानिक दृष्टि कितनी विकसित थी, इसका यह एक उदाहरण है। यह कोई कम गौरव की बात नहीं है कि रचना के कोई 2800 वर्ष बाद भी यह घोड़े की चिकित्सा के बारे में एक आदर्श या प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। फारसी, अरबी तथा अंग्रेजी भाषा में इसका अनुवाद हो चुका है। समय के साथ-साथ शालिहोत्र की कीर्ति बढ़ती ही जाती है। शालिहोत्र के अध्ययन की गहराई और पूर्णता का इस ग्रन्थ से पता चलता है।
(साभार ः पंजाब केसरी )

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