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न्याय का आसन निष्पक्ष होना चाहिये

गत 14 फर. को जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलवामा के पास जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमले में सी.आर.पी.एफ के हमारे चवालीस जवान शहीद हो गये थे। पूरा देश शोक-मग्न था, लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय की टुकड़े-टुकड़े गैंग के लोग तथा देश के विभिन्न संस्थानों में पढ़ने वाले कुछ कश्मीरी छात्र जवानों की शहादत पर खुशी मना रहे थे। इस पर देशवासियों का आक्रोशित होना स्वाभाविक ही था। आक्रोश में इक्का-दुक्का स्थानों पर अन्य छात्रों की कश्मीरियों से झड़प भी हो गई। ऐसी अपवाद स्वरूप हुई घटनाओं को सेकुलरवादी मीडिया ने बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया। उच्चतम न्यायालय ने तत्परता से दिखाते हुए तुरंत राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि कश्मीरियों की पूरी सुरक्षा की जाये।

यह पूरे देश के लिये प्रसन्नता की बात है कि उच्चतम न्यायालय अब यह देख रहा है, कि किसी के भी साथ अन्याय न हो। पहले ऐसा नहीं था। देश जानना चाहता है कि वर्ष 1984 में 31 अक्तू. के दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या हो गई थी। उसके बाद पूरे देश और विशेषकर दिल्ली में सिखों का नरसंहार शुरु हो गया था। उस समय सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्देश नहीं आये कि तुरंत यह भीषण कृत्य रोका जाये। उसके पाँच वर्ष बाद कश्मीर घाटी में पण्डितों पर अमानुषिक अत्याचार शुरु हुए और अन्ततः कश्मीरी पण्डितों को अपना घर छोड़ना पड़ा।

उस समय भी सुप्रीम कोर्ट का कोई ऐसा फरमान नहीं आया कि राज्य और केन्द्र सरकारें कश्मीरी पण्डितों पर हो रहे अत्याचार और उन्हें बाहर निकाले जाने को तुरंत रोकें।

कोई गो तस्कर कभी-कभी जनता के आक्रोश का शिकार हो जाता है। ऐसे ‘तिल’ को मीडिया ‘ताड़’ बना कर प्रस्तुत करता है। और इस मीडिया के प्रभाव में न्यायालय भी तुरंत जाँच कराये जाने के आदेश जारी कर देता है। ऐसी घटनाओं को ‘लीचिंग’ कहा जाता है। पाँच-सात लोगों से अधिक की भीड़ जब किसी अपराधी या आरोपी को पीट-पीट कर मार दे तो इसे लीचिंग कहा जाता है। पाँच साल पहले के ‘अखलाक-प्रकरण’ से यह शब्द चलन में आया।

गत 5 फर. को तमिलनाडु के तिरुभुवनम् (तंजावुर जिला)कस्बे में श्री रामलिंगम् को भी जिहादियों की एक भीड़ ने मार दिया। यह भी लीचिंग थी, पर अखलाकी मीडिया ने इस पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। देश की जनता प्रतीक्षा कर रही है कि सुप्रीम कोर्ट इस बारे में भी राज्य सरकार को कोई निर्देश देगा। केरल में संघ स्वयंसेवकों की हत्याओं की घटनायें गत चालीस वर्षों से हो रही हैं। फरवरी मध्य में कामरेड़ों ने दो युवा-कांग्रेसियों को भी मौत के घाट उतार दिया। सुप्रीम कोर्ट से देश का जन-मानस यह अपेक्षा कर रहा है कि इन घटनाओं पर भी निर्देश जारी होंगे।

न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी बँधी रहती है। इसका अर्थ यही है कि न्याय का आसन निष्पक्ष है। यह विश्‍वास सामान्य जन के मन में भी होना चाहिये। दूसरी बात यह है कि हिन्दू समाज परम्परा से उदार-मना और सहिष्णु है। सारे पंथ-उपपंथ और उपासना-पद्धतियों का सम्मान करने की सीख हिन्दू-संस्कृति ही देती है। एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात् सत्य एक है- विद्वान कई प्रकार से इसे प्रकट करते हैं- इसलिये ईश्‍वर प्राप्ति के सभी मार्ग श्रेष्ठ हैं, यह घोषणा भारत के अतिरिक्त विश्‍व में और कहीं नहीं की गई। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिये। पूरे देश में पढ़ने वाले कश्मीरियों की सुरक्षा प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है और हर भारतवासी यह समझता है। -रघुवंशी

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