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तीन-मूर्ति चौक के नाम के साथ हैफा जुड़ा

तीन-मूर्ति चौक दिल्ली में है। यहाँ तीन भारतीय सैनिकों की प्रतिमाएं लगी हैं। सभी के हाथों में लम्बे-लम्बे भाले हैं। इस चौक का नाम बदल कर अब तीन मूर्ति-हैफा चौक हो गया है। इजरायल के प्रधानमंत्री श्री नेतान्याहू गत 14 जन. को चार दिनों की भारत यात्रा पर आये तो हवाई अड्डे से सीधे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के साथ तीन मूर्ति चौक पहुँचे। दोनों राजप्रमुखों ने वहाँ श्रद्धांजलि अर्पित की। इसी के साथ इस चौक का नाम तीन मूर्ति-हैफा चौक हो गया।
हैफा इजरायल का एक बन्दरगाह है। आखिर हैफा का तीन-मूर्ति चौक से क्या सम्बन्ध है? प्रथम विश्‍व युद्ध में जर्मन और तुर्क सेनाओं ने हैफा पर अधिकार कर लिया था। उस समय आज का इजरायल नहीं बना था तथा पूरे फिलिस्तीन पर अंग्रेजों का कब्जा था। विश्‍व-युद्ध में जर्मन, तुर्की तथा आस्ट्रिया एक ओर थे तथा इंगलैण्ड, फ्रांस, रूस आदि उनके सामने थे। अंग्रेजों की सेना में बड़ी संख्या में भारतीय जवान भी थे। हैफा को छुड़ाने के लिये अंग्रेज सेनानायकों ने भारत की सैनिक टुकड़ियों को ही भेजा। जोधपुर लांसर्स, हैदराबाद लांसर्स तथा मैसूर लांसर्स के जवान इस घुड़सवार सेना में थे। इनके पास हथियार के नाम पर तलवारें और भाले ही थे, जब कि जर्मन-तुर्क सैनिकों के पास आधुनिक राइफलें थीं। भारतीय सैनिकों ने अद्भुत वीरता दिखाते हुए हैफा को मुक्त करा लिया।
23 सितम्बर 1918 के दिन भारतीय सैनिकों को यह विजय प्राप्त हुई थी। इजरायल में 23 सितम्बर को हर साल हैफा-दिवस मनाया जाता है और भारतीय जवानों की बहादुरी को याद किया जाता है। तीन मूर्ति चौक पर लगी तीन मूर्तियाँ उक्त सैनिक टुकड़ियों के सैनिकों की याद में ही लगाई गई थीं।

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