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जिस सुरंग से रास बिहारी बोस बच कर निकले वह खोजी गई

रास बिहारी बोस देश की आजादी के लिये संघर्ष करने वाले शीर्षस्थ क्रांतिकारियों में से एक थे। 23 दिस. 1912 को अंग्रेज वॉयसराय लार्ड हार्डिंग्ज पर एक शक्तिशाली बम फैंका गया। इस कार्रवाई के सूत्रधार रास बिहारी बोस ही थे। इस मामले में श्री अवध बिहारी, अमीरचंद तथा भाई बाल मुकुन्द को फाँसी हुई तथा प्रताप सिंह बारहठ जेल में शहीद हो गये। रास बिहारी बोस पर पुलिस को शक तक नहीं हुआ। वास्तव में अंग्रेज पुलिस उनको कभी गिरफ्तार नहीं कर सकी।
1915 में गदर पार्टी ने भारत को स्वतंत्र कराने की देश-व्यापी योजना बनाई थी। भारत में गदर पार्टी के प्रमुख उस समय रास बिहारी ही थे। समय से पहले भेद खुलने से यह योजना असफल हो गई तथा विष्णु पिंगले और करतार सिंह सराबा सहित सात क्रांतिकारियों को फाँसी हो गई। अनेक क्रांतिकारियों को जेल में बन्द कर दिया गया।
इस बार रास बिहारी भी पुलिस की नजरों में आ गये। वे चुपचाप एक पंजाबी व्यापारी का रूप धर कर कोलकाता पहुँच गये। अंग्रेज गुप्तचरों को वहाँ भी उनका सुराग लग गया पर वे लगातार जासूसों को चकमा देते रहे। आखिर हावड़ा के एक मकान में पुलिस ने रास बिहारी को घेर लिया। उस मकान में एक सुरंग थी। वह प्रसिद्ध क्रांतिकारी उस सुरंग से बच कर निकल गया और अंग्रेजी साम्राज्य को एक बार फिर छका कर जापान पहुँच गया। खिसियाए अंग्रेजों ने सुरंग बन्द कर मकान को ताला लगा दिया। इस मकान में बोस की बहिन सुशीला देवी का ससुराल था।
यह मकान बंगाल के हावड़ा जिले के करोला में है। अब यह जर्जर हो गया है। इसलिये इस मकान को गिराया जा रहा था। गत 23 अक्तूबर को जब इसे ध्वस्त किया जा रहा था तो उक्त सुरंग का पता चला।

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