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जिनके शासन-काल में कश्मीर का विस्तार मध्य एशिया और ईरान तक था

अद्वितीय विजेता सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़
अपना कश्मीर कश्यप ॠषि ने बसाया था। महाभारत काल में कश्मीर के राजा दामोदर के युद्ध में वीरगति प्राप्त कर लेने पर योगेश्‍वर श्रीकृष्ण ने विधवा रानी यशोवती को राज-सिंहासन पर बिठाया। महाभारत के युद्ध में कश्मीर उन दो राज्यों में से एक था जो न कौरवों के पक्ष में और न ही पाण्डवों के पक्ष में रहे । दूसरा राज्य महारानी रुक्मिणी का पीहर कुण्डिनपुर था।
महाभारत काल के बाद कश्मीर में अनेक राजवंशों का शासन रहा। इन राजवंशों में कर्कोटा वंश सबसे प्रसिद्ध हुआ। दक्षिणापथ में ढाई सौ वर्षों तक समृद्ध एवं शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य का शासन रहा था। इस साम्राज्य की स्थापना के सात सौ साल पहले कश्मीर में कर्कोटा साम्राज्य का उदय हुआ। इस वंश का शासन काल भी ढाई सौ वर्षों का था और यह भी भारतीय इतिहास का स्वर्णिम काल था।
कश्मीर के इसी कर्कोटा वंश के सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ हमारे गौरवशाली इतिहास के प्रातः स्मरणीय महापुरुषों में से एक थे। वे युगाब्द 3826(सन् 724) में कश्मीर के सम्राट बने ।
हजरत मोहम्मद साहब के महाप्रयाण के बाद नये खलीफा ने दुनिया को इस्लाम के झण्डे तले लाने का अभियान शुरू किया था। बात की बात में ईरान को जीत कर खलीफा की गिद्ध-दृष्टि भारत पर भी पड़ने लगी। महाराज ललितादित्य जानते थे कि भारत की स्वतंत्रता के लिये अरब हमलावर एक बहुत बड़ा खतरा होंगे। इस चुनौती का सामना करने के लिये पूरे भारत को एक-सूत्र में बाँधना जरूरी था। इसलिये एक चक्रवर्ती साम्राज्य की स्थापना के उद्देश्य से वे कश्मीर से सेना ले कर निकले। बारह वर्ष के सैनिक अभियान के परिणामस्वरूप बंगाल-उड़ीसा तक का पूरा क्षेत्र एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में खड़ा हो गया। बारह साल बाद जब उन्होंने कश्मीर में प्रवेश किया तो वे चीन को भी पक्का मित्र बना कर वापस लौटे थे।
अब उन्होंने पश्‍चिमी दिशा पर ध्यान दिया और खलीफा को खुली चुनौती देते हुए ईरान तथा तुर्की तक केसरिया ध्वज फहरा दिया। परिस्थितिवश वे सिन्ध की ओर नहीं जा सके, जहाँ महाराजा दाहिरसेन के वंशज खलीफा से संघर्ष कर रहे थे। सैंतीस वर्षों के शासन काल में सम्पूर्ण उत्तरी भारत को उन्होंने एकसूत्र में बाँध दिया। पूर्व में बंगाल और उड़ीसा तक, पश्‍चिम में सौराष्ट्र और पश्‍चिमोत्तर में ईरान तक उनका शासन हो गया। चीन के तत्कालीन नरेश को परास्त कर उन्होंने एक विजेता की तरह पीकिंग (बीजिंग) में प्रवेश किया। मध्य एशिया में आज के ताजकिस्तान, किर्गिजिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान आदि तक ललितादित्य का परचम लहराता था। तिब्बत भी उनके राज्य का अंग था।
सम्राट ललितादित्य एक महान् विजेता होने के साथ-साथ कुशल प्रशासक, न्याय-प्रिय, कला-प्रेमी, कलाकार और प्रजावत्सल थे। सम्राट समुद्रगुप्त की तरह वे भी वीणा-वादन में अत्यंत कुशल थे। विद्वानों और कलाकारों का वे बड़ा सम्मान करते थे। फ्रांस के राजा नेपोलियन के विजय अभियान महाराज ललितादित्य के अभियानों के सामने कहीं नहीं ठहरते। उनके जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी भारत में तो हुए हैं किन्तु दुनिया में और कहीं नहीं हुए।
मार्तण्ड मन्दिर
सम्राट ललितादित्य को उनके बनवाये प्रसिद्ध मार्तण्ड मन्दिर के लिये भी याद किया जाता है। कश्मीर के अनंतनाग के पास आज भी इस विशाल और भव्य मन्दिर के भग्नावशेष मौजूद हैं। बाद में उड़ीसा के गंग वंश के सम्राट नरसिंहवर्मन ने कोणार्क का प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर बनवाया था, पर कश्मीर में बना मार्तण्ड मन्दिर कहीं अधिक बड़ा एवं भव्य था। इसके अवशेष ही बताते हैं कि मन्दिर कितना विलक्षण रहा होगा। यह भारत की निर्माण कला का अद्वितीय नमूना है। महाराज ललितादित्य के राजदरबार में एक से बढ़ कर एक विद्वान और कला-मर्मज्ञ थे। सम्राट विक्रमादित्य के जैसे ही उनका दरबार भी नौ नर-रत्नों से प्रतिष्ठित था।
सम्राट वैष्णव थे किन्तु शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन आदि सभी उपासना पद्धतियों को कश्मीर में प्रोत्साहन मिलता था। उन्होंने एक अत्यंत विशाल बौद्ध विहार भी बनवाया था। इसके लिये राजकोष से 84 हजार तोला (सवा छब्बीस मण) सोना दिया गया। यह बौद्ध विहार भी शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ था। उनका एक सेनापति बौद्ध तथा एक मंत्री कान्यकुन्य नाम का तुर्क था। वह भी बाद में बौद्ध हो गया।

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