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जन्म दिन 21 मार्च पर विशेष

महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट
19 अप्रेल 1975 के दिन भारत ने पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेज कर इतिहास बनाया था। इस कृत्रिम उपग्रह को आर्यभट्ट नाम दिया गया। कौन थे ये आर्यभट्ट?
आर्यभट्ट गणित और खगोल शास्त्र के महान् विद्वान थे। उन्होंने हजारों वर्षों पहले लिखे गये सूर्य सिद्धांत, वशिष्ठ सिद्धान्त, पितामह सिद्धान्त आदि ग्रन्थों में बताये गये गणित और खगोल विज्ञान के सूत्रों का गहराई से अध्ययन किया। तत्पश्‍चात इन सभी सिद्धान्तों को नये एवं क्रमबद्ध तरीके से अपने ग्रन्थ ‘आर्यभट्टीय’ में प्रस्तुत किया। उनके लगभग सवा सौ वर्षों के बाद आर्यभट्ट नाम के एक और वैज्ञानिक हुए जिन्होंने पूर्ववर्ती आर्यभट्ट के सिद्धान्तों में कुछ नये विषय और जोड़े। उनका ग्रन्थ महाआर्यभट्टीय भी गणित और खगोलशास्त्र की अमूल्य निधि है।
आर्यभट्टीय की रचना- आर्यभट्ट (प्रथम) का जन्म 21 मार्च सन् 476 को कुसुमपुर में हुआ। तब मगध की राजधानी पाटलिपुत्र को कुसुमपुर भी कहा जाता था। मगध में उस समय प्रसिद्ध गुप्त वंश के कुमारगुप्त (तृतीय) का शासन था। महाराज कुमारगुप्त आर्यभट्ट का बड़ा सम्मान करते थे और राज दरबार में उनके लिये विशेष स्थान तय कर रखा था।
प्राचीन काल से वेदों के एक उपांग ‘ज्योतिष’ की पढ़ाई गुरुकुलों में होती आ रही थी। आर्यभट्ट ने भी ज्योतिष का विस्तृत अध्यन किया। खगोल विज्ञान और गणित ज्योतिष के आवश्यक अंग हैं। आर्यभट्ट ने दोनों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद उन्हें सरल एवं अधिक ग्राह्य बनाने की जरूरत समझी। इसी के बाद उन्होंने ‘आर्यभट्टीय’ की रचना की। इस महान् ग्रन्थ में उन्होंने स्पष्ट किया कि सौरमण्डल के सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं। पृथ्वी भी सूर्य के चक्कर लगाने के साथ अपनी ध्ाुरी पर भी लगभग साठ घटी (24घंटे) में एक बार घूम जाती है।
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त - आर्यभट्ट ने यह भी बताया कि सभी ग्रह परस्पर गुरुत्वाकर्षण के कारण एक निश्‍चित कक्षा (मार्ग) में सूर्य का चक्कर लगाते हैं। इसी के साथ उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वस्तुएं पृथ्वी की ओर गिरती हैं।
कापरनिकस ने सोलहवीं शताब्दी के शुरु में यह बताया था कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है और न्यूटन ने उसके सौ सालों बाद गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त बताया। दोनों से हजार साल पहले आर्यभट्ट ने दोनों बातों का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया है।
विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न आर्यभट्ट ने सभी ग्रहों का स्वरूप, सूर्य-परिभ्रमण का समय, तिथियाँ, संवत्सर तथा कल्प तक की कालगणना का वर्णन आर्यभट्टीय के दूसरे खण्ड कालक्रियापाद में किया है। तीसरे खण्ड ‘गोलपाद’ में विस्तार से खगोल विज्ञान की जानकारी दी गई है।
पाई का सटीक मान- उक्त ग्रन्थ का प्रथम खण्ड ‘गणितपाद’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। गणित सभी विज्ञानों का आधार है और इस खण्ड में अंक, बीज और रेखागणित के साथ-साथ त्रिकोणमिति, कोर्डिनेट ज्यामेट्री और केल्कुलस के भी सूत्र बताये गये हैं। इनडिटर्मिनेट ईक्वेशन्स (अनिर्दिष्ट समीकरण) तथा साइन टेबिल भी इसमें दिये गये हैं।
गणित में ‘ ’(पाई) का प्रयोग हर जगह होता है। इसका मान 22/7 है। आर्यभट्ट ने पाई का एकदम सही मान आर्यभट्टीय में बताया है। ‘चतुरधिकम्...’श्‍लोक के अनुसार 62532 परिधि वाले वृत्त में उसके व्यास (20,000) का भाग देने पर का मान प्राप्त होता है। यह मान 3.1416 आता है, जो सही मान है।
चौहत्तर वर्षों तक ज्ञान साधना करने के बाद सन् 550 में उन्होंने महाप्रयाण किया।

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