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चुनाव आते ही छद्म सेकुलर समूह सक्रिय

गत 2 अप्रेल को अंग्रेजी दैनिक ‘दी हिन्दू’ में समाचार छपा कि कुछ (खास)लेखकों ने बयान जारी कर मोदी सरकार के विरुद्ध (कांग्रेस के पक्ष में) मतदान करने की अपील की है। इसमें कुछ भी आश्‍चर्यजनक नहीं है क्योंकि इस तरह के तथाकथित बुद्धिजीवियों के संगठन, ‘अभिव्यक्ति कीआजादी’ समूह, सेकुलर लेखक, अभिनेता कभी जेएनयू की टुकड़े-टुकड़े गेंग के समर्थन में, कभी अफजल गुरु की फाँसी रुकवाने के लिए, कभी शहरी नक्सलियों के समर्थन में, तो कभी आतंकवादियों के मानवाधिकार के नाम पर भाजपा सरकार के विरुद्ध धरना, प्रदर्शन, अवार्ड वापसी जैसे काम करते रहते हैं।

वास्तव में पिछले 60 वर्षों में कांग्रेसी सरकारों के कार्यकाल में नेताओं ने अपने करीबी व्यक्तियों को लाभ पहुँचाने के लिए न केवल उन्हें विभिन्न सरकारी संरक्षण व सहायता पाने वाली संस्थाओं में लाभ के पदों पर बिठाया बल्कि उनके द्वारा जनहित के नाम पर बनाए गए संगठनों को सरकारी,गैर सरकारी, विदेशी सहायता दिलाने की भी व्यवस्था की ताकि वे ठाले बैठे विलासितापूर्ण जीवन यापन कर सकें। यही नहीं देश-विदेश से प्राप्त धन से देश में विध्वंसात्मक गतिविधियाँ चलाने, धर्म-जाति के नाम पर विद्वेष, नफरत फैलाने वाले आंदोलन खड़े करने तथा आदिवासी बहुल क्षेत्रों में धर्मान्तरण के लिए भी उपयोग में लेने की जानकारी है।

मोदी सरकार ने सभी एनजीओ को अपने खातों की आडिट कराने को कहा। एक साल का समय देने पर भी जिन संगठनों ने अपना आडिट नहीं कराया उनको सरकारी सहायता तथा विदेशों से दान तथा चंदा लेने से रोक दिया। बस यहीं से इन छद्म संगठनों के आकाओं के पेट में दर्द होना शुरु हो गया। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकारी सहायता (देश के पैसे) पर पले लोगों पर नमक का हक अदा करने का भी दायित्व है।

समाचार के अनुसार भारतीय लेखक संघ ने आगामी लोकसभा चुनाव में समझदारी से वोट डालने की अपील करते हुए वर्तमान सरकार के विरुद्ध वोट डालने को कहा है।

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