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गोबर की ईंटें मकानों को मजबूती दे रही हैं

गोपाल के इस देश में गोपालन इसलिये कम हो रहा है कि गायों को पालने में खर्च अधिक होता है और आय कम। पहले ऐसा नहीं था क्योंकि बैल खेती के काम आते थे और गोमूत्र तथा गोबर खाद, कीट-नाशक आदि के रूप में प्रयोग किये जाते थे।
आधुनिक साधनों ने बैल को निरुपयोगी बना दिया तथा जैविक खाद व कीटनाशकों का स्थान हानिकारक रासायनिक खाद-कीटनाशकों ने ले लिया। इन रासायनिक पदार्थों से जब पर्यावरण दूषित होने लगा और महामारियाँ बढ़ने लगीं तो एक बार फिर गोबर-गोमूत्र का महत्व ध्यान में आने लगा है।
पंचगव्य अर्थात् गाय के दूध, दही, घी एवं गोमूत्र व गोबर से कई प्रकार की कारगर दवाइयाँ अब बनने लगी हैं। जैविक खाद तो गोबर से तैयार होती ही है, हरियाणा के अंबाला में गोबर से ईंट, प्लास्टर तथा टाइलें भी तैयार की जा रही हैं। गोबर की ईंटे भवन निर्माण के काम भी आ रही हैं और प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि ये ईंटें सामान्य ईंटों से अधिक मजबूत रहती हैं। इसी प्रकार गोबर से दीवारों पर लगाने का प्लास्टर भी तैयार किया जा रहा है। इसे वैदिक प्लास्टर नाम दिया गया है और यह किसी भी प्रकार के विकिरण से सुरक्षा प्रदान करता है। अम्बाला में ही गोबर की उत्कृष्ट टाइलें भी तैयार की जा रही हैं।

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