layout

wide boxed

direction

ltr rtl

style

light dark

skins

default alimbalmarina somnambula juicy spoonflower goats nutricap keratin vit courtly attire mondrian sage walking by

bg pattern

1 2 3 4 5 6 7 8

bg image

1 2 3 4 5 6 7 8

गांव-गांव बलिदान हुए आजादी के परवाने इतिहास के पन्नों तक उन्हें लाना ही अमृत महोत्सव

Error message

Deprecated function: Array and string offset access syntax with curly braces is deprecated in include_once() (line 20 of /home/patheykan/public_html/includes/file.phar.inc).

आजादी के आंदोलन में लाखों माताओं की गोद सूनी हुई, लाखों बहनों से भाई की कलाई छिनी, ऐसे कई बलिदानियों को इतिहास के पन्नों में जगह ही नहीं मिल पाई। आजादी के 75वें वर्ष पर मनाए जा रहे अमृत महोत्सव में गांव-गांव के ऐसे बलिदानियों के परिवारों को ढूंढकर उनका अभिनंदन किया जाए ताकि उन परिवारों की तथा हमारी पीढ़ियां इस बात पर गर्व कर सकें कि उनके पुरखों ने देश के स्वाधीनता आंदोलन में योगदान दिया था। यह विचार भारतीय इतिहास संकलन समिति के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री बालमुकुन्द पाण्डे ने मंगलवार को उदयपुर में ‘मेवाड़-वागड़ में आजादी की गूंज (1818-1947)’ विषयक संगोष्ठी में व्यक्त किए।
जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ के सभागार में 21 दिसम्बर को आयोजित इस एक दिवसीय संगोष्ठी में जहां मेवाड़-वागड़ के स्वाधीनता सेनानियों के स्वाधीनता संग्राम में योगदान पर चर्चा हुई वहीं, दिवंगत सेनानियों का स्मरण करते हुए परिवारजनों का अभिनंदन किया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में श्री पाण्डे ने कहा कि सम्पूर्ण भारतवर्ष कभी पराधीन नहीं रहा, भारत के लोग हर वक्त संघर्षरत रहे, कभी मन से गुलामी को स्वीकार ही नहीं किया। चाहे वनवासी हों, गिरवासी हों, किसान हों, दलित हों, यहां तक कि संन्यासी हों, सभी ने अपने-अपने स्तर पर ‘स्व’ अर्थात् स्वाभिमान के जागरण का अभियान जारी रखा, तभी हमारी संस्कृति संरक्षित रह सकी और आगे की पीढ़ियों तक संघर्ष की यह ऊर्जा स्थानांतरित होती रही।
इतिहास लेखन में स्वाभिमान के बजाय अपमान की घटनाओं को लिखा गया। उन्होंने वास्को-डी-गामा का उदाहरण देते हुए कहा कि पुस्तकों में यह पढ़ाया जाता रहा कि उसने भारत को खोजा, इसका मतलब क्या भारत पहले नहीं था। जबकि, हकीकत यह है कि वास्को-डी-गामा खुद लिखता है कि वह एक गुजरात के व्यापारी के साथ पहली बार भारत पहुंचा। अंग्रेज भी व्यापार की नीति से नहीं बल्कि अपनी कॉलोनी स्थापित करने और ईसाइयत के प्रचार के उद्देश्य से आए थे।
श्री पाण्डे ने 1857 के आंदोलन को आध्यात्मिक आंदोलन की संज्ञा देते हुए कहा कि यह ‘स्व’ के जागरण का आंदोलन था, उस आंदोलन में साढ़े तीन लाख लोग बलिदान हुए। 1911 तक का आंदोलन ‘स्व’ के जागरण का आंदोलन बना रहा, उसके बाद इसने राजनीतिक रूप लिया। पाण्डे ने कहा कि इतिहासकारों ने भी न्याय नहीं किया और स्वाधीनता के कई परवानों को पन्नों पर नहीं उकेरा। पाण्डे ने आह्वान किया कि आज के इतिहासकार आजादी के इस अमृत महोत्सव पर ऐसे ही स्वातंत्र्य वीरों को उजागर करें, उनके परिवारों को अपनी लेखनी से मान दें ताकि उनका बलिदान गुमनामी से बाहर आ सके।
कार्यक्रम में गोविन्द गुरु के पौत्र महंत सतीश गिरि, भगत आंदोलन से जुड़े वासुदेव महाराज, मोतीलाल तेजावत की पुत्रवधु, रघुनाथ पालीवा के पौत्र प्रतीक पालीवाल, तख्त सिंह भटनागर के भतीजे कैलाश भटनागर, सुजानमल जैन के पुत्र ललित जैन, रामचंद्र बागोरा के परिवारजन उपस्थित थे। उन्हें सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति प्रो. एसएस सारंगदेवोत ने कहा कि सत्य को आगे लाए बिना शिक्षा अधूरी है।
समापन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चित्तौड़ सह प्रांत प्रचारक श्री मुरलीधर ने वागड़ के आजादी के लोक गीत ‘नी मानूं नी मानूं भूरेटिया नी मानूं’ की पंक्तियां दोहराते हुए कहा कि भारत ने मोहम्मद बिन कासिम से ओसामा बिन लादेन तक किसी को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि स्वराज-स्वदेशी-स्वधर्म की त्रिवेणी है हमारी आजादी।
मुख्य वक्ता गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय नोएडा के पूर्व कुलपति प्रो. भगवती प्रसाद शर्मा ने कहा कि शोधपत्रों में भारत के इतिहास के गौरवशाली तथ्य हैं, लेकिन वे शोधपत्र पुस्तकालयों तक ही सीमित हैं, जब तक वे रेफरेंस व टेक्स्टबुक के रूप में नहीं आएंगे तब तक भारतीय संस्कृति का गौरवशाली इतिहास सामने नहीं आ पाएगा।

© 2016 All rights reserved. Patheykan Website maintaining by 3 Edge Technologies