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क्यों भटका हुआ है भारत का मीडिया ?

भारत के मीडिया का जोड़ पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलता। अन्य देशों के संवाद-माध्यम अपने देश हितों के लिये भी काम करते हैं, वहीं भारत के समाचार-पत्र और चैनल अपने देश की खिल्ली उड़ाने में आगे रहते हैं। भारत का अंग्रेजी मीडिया तो देश-विभाजक प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहित करता रहता है। भारतीय इतिहास, संस्कृति और श्रेष्ठ परम्पराओं में मीडिया को कुछ भी अच्छा नहीं दिखता। समाज के दोष और नकारात्मक प्रवृत्तियाँ ही उन्हें दिखाई देती हैं और उन्हीं को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना मीडिया का उद्देश्य रहता है। बहुसंख्यक समाज पर कश्मीर में यदि क्रूरता और अत्याचार हो तो मीडिया अनदेखी करता है और अल्पसंख्यकों की वकालत के लिये यह मुस्तैद बना रहता है।
आतंकियों, उग्रवादियों, पत्थरबाजों, हत्यारों आदि के मानवाधिकारों के लिये हमारा मीडिया जमीन आसमान एक कर देता है और आतंक के शिकार जवानों या जनता के लोगों को यह मक्खी-मच्छर समझता है। दिल्ली में बारह साल पहले, अक्तूबर 2005 में सरोजिनी नगर, पहाड़गंज तथा गोविंदपुरी में बमों के धमाके हुए थे। इनमें इंडियन मुजाहिदीन गिरोह के कुछ आतंकी पकड़े गये थे। इनमें से दो रफीक शाह और मोहम्मद हुसैन को न्यायालय ने बीती फरवरी में बरी कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस (25 फर.) जैसे समाचार पत्रों और एन डी टी वी जैसे चैनलों ने आसमान सर पर उठा लिया कि दो लोगों की जिन्दगी के बारह साल पुलिस और प्रशासन के कारण बेकार हो गये। बड़ी विचित्र बात है, दिवाली से ठीक एक दिन पहले हुए उक्त धमाकों में साठ निर्दोष लोग मारे गये थे। ज्योतिपर्व से पहले कई परिवारों में अंधेरा हो गया। उनसे सहानुभूति न तो इंडियन एक्सप्रेस ने दिखाई और न ही किसी चैनल ने। उल्टे जिहादियों के लिये ही आंसू बहाये गये।
स्वामी असीमानन्द ने कोई दोष न होते हुए भी आठ साल जेल में काटे। साध्वी प्रज्ञा सिंह निर्दोष होने के बाद भी 25 अप्रेल तक जेल में ही थीं। उनके जीवन के जो साल जेल में बर्बाद हो गये उनकी चिन्ता मीडिया को नहीं है।
आखिर क्यों भारत का मीडिया खाने वाली थाली में ही छेद करने वाला है?
गत जनवरी में अमरीका की गुप्तचर संस्था सी आई ए ने हजारों गोपनीय फाइलें सार्वजनिक की हैं। उनमें इस रहस्य से पर्दा उठाया गया है। जिन दिनों साम्यवादी रूस और अमरीका के बीच शीत-युद्ध चल रहा था, रूसी खुफिया एजेंसी के.जी.बी. तथा अमरीका की सी.आई.ए. में एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ लगी रहती थी। दोनों ही खुफिया संगठनों का आतंक और दबदबा पूरी दुनिया में था। सत्ताईस वर्ष पहले सोवियत संघ के बिखर जाने के बाद के.जी.बी. को भी भंग कर दिया गया। अब रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने के.जी.बी. जैसा ही एक नया खुफिया संगठन एम.जी.बी. बनाया है, जिसमें ढाई लाख एजेंटों की भर्ती की जानी है। अमरीकी सी.आई.ए. पहले जैसा ही है। इसके जासूसी के तरीके अब अत्याधुनिक तकनीक वाले हो गये हैं, किन्तु आतंक पहले जैसा ही है।
मित्रोखिन पेपर्स
बारह वर्ष पूर्व 2005 में के.जी.बी. के एक पूर्व जासूस मित्रोखिन ने के.जी.बी. के कई रहस्य खोले थे। उन्हीं दिनों खुद रूस ने के.जी.बी. के हजारों दस्तावेजों को गोपनीयता की कैद से निकाल कर सार्वजनिक किया था। सी.आई.ए. ने भी गत 17 जनवरी को हजारों गोपनीय दस्तावेजों के लगभग एक करोड़ बीस लाख पृष्ठों को अपनी वेबसाइट पर जारी किया है। दोनों ही एजेंसियों के दस्तावेजों में भारत से सम्बन्धित हैरान कर देने वाले खुलासे किये गये हैं। आश्‍चर्य की बात यह है कि इन दोनों घोर विरोधी संगठनों की फाइलों में भारत के बारे में एक जैसी सूचनायें हैं।
इन गोपनीय फाइलों में बताया गया है कि रूसी एजेंसी ने भारत के मीडिया को खरीद रखा था। सी आई ए और के जी बी दोनों ने खुलासा किया है कि भारत के कम्यूनिस्टों को सोवियत संघ से अकूत धन मिलता था। प्रारम्भ से ही वाममार्गी भारत के टुकड़े-टुकड़े करने के षड़यंत्रों में लिप्त थे और इसके लिये उन्हें के.जी.बी के साथ-साथ सी.आई.ए. का भी समर्थन मिलता था और आज भी मिल रहा है। ये दस्तावेज बताते हैं कि दोनों बदनाम संगठनों ने कुछ दलों के नेताओं और सांसदों को भी अपना गुलाम बना रखा था।
रूस का हस्तक बना
सी.आई.ए. के दस्तावेजों में 32 पृष्ठों की एक फाइल भारत के समाचार-पत्रों, संवाद एजेंसियों से सम्बन्धित है। इसमें बताया गया है कि दिल्ली स्थित सोवियत संघ का दूतावास भारत के प्रमुख समाचार पत्रों व एजेंसियों में झूठी खबरें छपवाता था। अंग्रेजी अखबार द हिन्दू, स्टेट्समेन, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इण्डिया, कोलकाता की अमृत बाजार पत्रिका आदि तथा संवाद एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया में रूस ने उन दिनों एक लाख साठ हजार झूठी खबरें प्रकाशित कराईं थीं। आजादी के बाद के लगभग चालीस सालों तक यह खेल चलता रहा। ऐसे कुछ गलत समाचार अमरीका, इंगलैण्ड आदि के बारे में हैं तथा कुछ भारत के राष्ट्रवादी संगठनों के बारे में हैं।
दस्तावेजों में बताया गया है कि सन् 1980 के आस-पास कम से कम दो सौ पत्रकारों को साम्यवादी रूस से पैसा मिलता था। वर्ष 2005 में पूर्व के.जी.बी जासूस मित्रोखिन ने बताया था कि भारत का मीडिया देश-हित के स्थान पर रूस के हितों के लिये काम कर रहा था। सन् सत्तर और अस्सी के दशकों में सोवियत संघ हर साल चालीस पत्रकारों को रूस की मुफ्त यात्रा कराता था। सरकारी संवाद समिति ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया’ पूरी तरह से सोवियत रूस के प्रचार का काम करती थी।
जनवरी 2017 में सार्वजनिक किए गये सी.आई.ए. के दस्तावेजों में बताया गया है कि अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दू’ तो पूरी तरह साम्यवादी रूस के कब्जे में था और झूठी खबरें छापने में सबसे आगे था। भारत के मीडिया की जो दयनीय स्थिति आज है वह इसी कारण से है। आज भी भारत के समाचार-पत्र और दूरदर्शन चैनल अपने देश को धिक्कारते हैं और अन्य देशों की प्रशंसा करते दिखाई देते हैं। भारत के गौरवशाली इतिहास, परम्परा और संस्कारों की वे मजाक उड़ाते हैं और विदेशों से उधार लिये बासी विचारों का प्रचार करते नजर आते हैं। पहले वे सोवियत संघ से धन और सुविधाएं प्राप्त करते थे, अब सी.आई.ए. से पैसे पाते हैं।
वामपंथियों का राष्ट्र-द्रोह
सी.आई.ए. के उक्त दस्तावेजों में एक फाइल भारत के साम्यवादियों पर भी है, जिसका नाम है ‘पोलिटिकल-कम्यूनिस्ट एक्टिविटीज।’ इस फाइल की मुख्य बातें इस प्रकार हैं-
- कामरेडों ने पूर्वी पंजाब को एक अलग देश सिक्खिस्तान तथा दार्जिलिंग और कश्मीर को भी अलग देश बनाने का षड़यंत्र रचा। कामरेड चाहते थे कि कश्मीर भारत से अलग हो रूस में मिल जाये।
आज भी कश्मीर के लिये आजादी की कॉव-कॉव अलगाववादियों से अधिक वाममार्गी ही कर रहे हैं।
- आजादी मिलने के बाद से ही कामरेड सशस्त्र क्रांति के द्वारा भारत को तोड़ने में लग गये थे। भारतीय सेना भी उनका निशाना थी तथा वे सेना में विद्रोह पैदा करने की साजिश भी कर रहे थे।
आज भी नक्सलियों के रूप में कामरेड उक्त गर्हित उद्देश्य को पूरा करने में लगे हैं।
- भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी ने तत्कालीन महासचिव बी.टी. रणदिबे के नेतृत्व में 9 मार्च 1949 के दिन सशस्त्र विद्रोह के द्वारा पं. नेहरू की सरकार पलटने का षड़यंत्र किया था। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने कुशलता से इसे कुचल दिया।
- 1962 के चीन-भारत युद्ध में साम्यवादियों ने न केवल चीन का समर्थन किया, स्वागत किया, बल्कि भारतीय सेना में विद्रोह भड़काने का भी षड़यंत्र किया।
- साम्यवादी आदिवासी क्षेत्रों को भी भारत से तोड़ने का षड़यंत्र कर रहे थे। पूर्वोत्तर के राज्यों में भी वे लगातार अलगाववाद पैदा कर रहे थे।
भारत में साम्यवादियों का इतिहास केवल देशद्रोह और अराजकता का इतिहास है। स्थापना के समय से ही कामरेड भारत में आपसी भेद-भाव और वैमनस्य उत्पन्न करने के साथ-साथ देश तोड़ने के षड़यंत्रों में लग गये थे। रूस और जर्मनी की मित्रता के समय साम्यवादी अंग्रेजों के शत्रु बने हुए थे। जैसे ही द्वितीय विश्‍वयुद्ध में रूस और इंग्लैण्ड एक साथ हुए वाममार्गी सियारों ने भी रंग बदल लिया और भारत में अंग्रेजी शासन के समर्थक बन गये।
देश को जब आजादी मिली तो भारत के कामरेडों ने भारत की एकता के प्रयत्नों में जम कर रोड़े अटकाये। एक अलग सिख राष्ट्र सिक्खिस्तान बनाने के आन्दोलन के सबसे बड़े समर्थक वामपंथी ही थे। कश्मीर को भारत से अलग रखने के लिये भी उन्होंने पूरा जोर लगाया। शेख अब्दुल्ला को कामरेडों का पूरा समर्थन था। हैदराबाद निजाम को भारत में शामिल न होने के लिये भड़काने वालों में कामरेड सबसे आगे थे। पूर्वोेत्तर के सातों राज्यों का अलगाववाद मिशनरियों और कामरेडों की ही देन है। 1962 के चीनी आक्रमण के समय कामरेडों के चेहरों पर पड़ा नकाब पूरी तरह उतर गया। साम्यवादियों ने न केवल चीनी सेना को मुक्तिवाहिनी बता कर स्वागत किया, बल्कि भारतीय सेना में विद्रोह उत्पन्न करने का भी असफल प्रयास किया।
आज भी जवाहर लाल नेहरु वि.वि. जैसे शिक्षण संस्थानों में वाममार्गी शिक्षक छात्रों के मस्तिष्क में राष्ट्र-विरोधी जहर ही घोल रहे हैं।
रूस के कहने पर मंत्री बने
सन् 1985 की सी.आई.ए. की एक फाइल ‘सोवियत्स इन इण्डिया’ भी सार्वजनिक किये गये दस्तावेजों में से एक है। इसमें दिये गये तथ्य आश्‍चर्यजनक रूप से के.जी.बी. के 2005 में प्रकट किये गये तथ्यों से मिलते हैं। दोनों दस्तावेजों के अनुसार श्रीमती इंदिरा गाँधी के समय चालीस प्रतिशत सत्ताधारी दल के सांसदों को सोवियत संघ पैसा देता था। कुछ और दलों के संसद-सदस्यों को भी के.जी.बी. से रिश्‍वत मिलती थी। कांग्रेस व अन्य दलों के डेढ़ सौ सांसदों को साम्यवादी रूस ने अपने देश में आमंत्रित किया तथा उनकी जम कर आव-भगत की थी।
उस समय की दोनों साम्यवादी पार्टियों को तो के.जी.बी. से पैसा मिलता ही था, कई सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को भी रूस के दिल्ली स्थित दूतावास से पैसे मिलते थे। कश्मीर के मामले में रूस संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के पक्ष में रहता था, किन्तु शेख अब्दुल्ला की नेशनल-कान्फ्रेंस को भी पैसा देता था। सोवियत संघ के कहने पर ही शेख ने कश्मीर में आन्दोलन शुरू किया था।
10 अप्रेल 1970 के कुछ अन्य दस्तावेजों में बताया गया है कि श्रीमती गांधी की सरकार में राजा दिनेश सिंह को विदेश मंत्री रूस के दबाव के कारण ही बनाया गया था।
सी.आई.ए. के उक्त दस्तावेज बताते हैं कि स्व. राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में भी कई सांसदों और मंत्रियों को रूस से पैसा मिलता था।
सुभाष बोस को हटाया
अब तक गोपनीय रहीं उक्त फाइलों में आजादी के पहले की घटनाओं पर भी प्रकाश डाला गया है। 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिये नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने नामांकन पत्र भरा था। महात्मा गांधी ने पट्टाभि सीतारमैया को अध्यक्ष पद acheter du cialis के लिये खड़ा किया। महात्मा जी के पूरा जोर लगाने के बाद भी सुभाष बाबू भारी बहुमत से जीत गये। इस पर कांग्रेस में ऐसा वातावरण बनाया गया कि सुभाष बोस काम ही न कर सकें। बाध्य हो कर उन्हें अध्यक्ष पद से त्याग पत्र देना पड़ा। अमरीकी एजेंसी की फाइलें बताती हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय के दबाव के कारण सुभाष बाबू से असहयोग किया गया। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि नेता जी कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहें।
भारत की आजादी के समय लार्ड माउण्टबेटन भारत के वायसरॉय थे। उनकी पत्नी एडविना एक साम्यवादी थीं और कट्टर साम्यवादी वी.के.कृष्ण मेनन के कहने पर माउंटबेटन को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया था। कामरेड कृष्ण मेनन ही 1962 में चीन के हाथों भारत की हार के जिम्मेदार थे।
सेन्ट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सी.आई.ए.) के उक्त खुलासों से यह संदेह भी पक्का हो जाता है कि पं.दीनदयाल उपाध्याय की हत्या में निश्तिच रूप से के.जी.बी. का हाथ रहा होगा।

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