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आतंकाधिकार या मानवाधिकार आयोग?

आतंकी को दस लाख और श्रद्धालुओं को कौड़ी भी नहीं
सेकुलर गठजोड़ के दुष्प्रभाव से मानवाधिकार की वकालत करने वाले सभी संगठन वास्तव में आतंकियों, नक्सलियों और देश के दुश्मनों के अधिकारों की रखवाली करने वाली संस्थायें बन गये हैं। इन्हें आतंकियों, नक्सलियों तथा दुश्मन देश के जासूसों के मानवाधिकारों की तो भारी चिन्ता रहती है किन्तु शहीद होने वाले सैनिकों, पीड़ित हिन्दुओं और आतंकियों के शिकार बने तीर्थ यात्रियों के मानवाधिकारों की कोई परवाह नहीं है। पत्थरबाजों और उपद्रवियों से मतदान अधिकारियों की सुरक्षा के लिये चार महीने पहले सेना के मेजर गोगोई ने एक आतंकी को जीप के बोनट पर बाँध दिया था। राज्य के मानवाधिकार आयोग को इससे बड़ी पीड़ा हुई। इसलिये उसी आतंकी फारुक डार को जम्मू-कश्मीर के मानवाधिकार आयोग ने दस लाख रु. देने का निर्णय दिया है। राज्य सरकार को कहा गया है कि जीप पर बाँधने से उक्त पत्थरबाज के अधिकारों का हनन हुआ है और इसलिये उसे क्षतिपूर्ति के रूप में दस लाख रुपये दिये जायें।
जिस दिन यह घोषणा की गई उसी दिन अमरनाथ यात्रियों की एक बस पर आतंकियों ने हमला कर दिया। ताबड़तोड़ बरसती गोलियों से सात श्रद्धालु मारे गये तथा लगभग दो दर्जन लोग घायल हुए। राज्य का मानवाधिकार आयोग बताये कि मृतक तीर्थयात्रियों के भी कुछ मानवाधिकार थे या नहीं? और यदि थे तो उनकी क्षतिपूर्ति की राशि कितनी होगी? अभी तक तो आयोग ने बलिदान हुए श्रद्धालुओं को एक कौड़ी भी नहीं दी है?

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