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अयोध्या का रास्ता दिखाता सोमनाथ मंदिर

पुनर्निर्माण के 66 वर्ष पूरे होने पर विशेष...
सोमनाथ के शिव मन्दिर और अयोध्या के प्राचीन श्रीराम मन्दिर के इतिहास में बहुत समानताएं हैं। दोनों ही मंदिर मज़हबी असहिष्णु आक्रांताओं द्वारा कई बार ध्वस्त किए गए और अवसर पाते ही फिर से बना दिये गये और मुगलों द्वारा फिर तोड़ दिए गए। भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की दृढइच्छाशक्ति से स्वतंत्रता के तुरन्त बाद गुजरात के प्रभास पाटण में सोमनाथ मन्दिर का पुननिर्माण हो गया और रास्ता दिखा गया कि हजारों वर्ष की गुलामी के प्रतीक कैसे सुधारे जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि राष्ट्रवाद बनाम पंथनिरपेक्षता की बहस उस समय नहीं चली थी। उस समय भी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सहित राजनेताओं का एक धड़ा था जो लाखों भारतीयों की इच्छा पर छद्म पंथनिरपेक्षता को हावी करना चाहता था, लेकिन सरदार पटेल और उनके सहयोगी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी एवं नरहरि विट्ठल गाडगिल के सामने उनके तर्क नहीं टिक सके।
10 नवम्बर 1025 को गजनी के महमूद ने सोमनाथ पर पहली बार हमला किया था। महमूद ने सम्पत्ति तो लूटी ही, शिवमूर्ति पर प्रहार करके उसे भी तोड़ दिया। मन्दिर फिर बना, फिर टूटा, बार-बार बना और आक्रमणकारियों का शिकार हुआ।

ब्रिटिश शासन काल में मूल मन्दिर उसी तरह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में रहा। 1947 में स्वतंत्रता के बाद 14 नवम्बर को सरदार पटेल ने प्रभास पाटण में सोमनाथ मन्दिर के भग्नावशेषों के दर्शन किए और वहीं जनसमुदाय के बीच यह घोषणा कर दी कि भारत सरकार सोमनाथ मन्दिर का पुनर्निर्माण करेगी। महात्मा गांधी ने इसका समर्थन किया। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में केवल मौलाना आजाद ने उद्ध्वस्त मन्दिर को मूल रूप में रखते हुए नई जगह पर नया मन्दिर बनाने का सुझाव दिया। पर अधिकतर मंत्री पुनर्निर्माण के पक्ष में रहे।
1950 में सरदार पटेल के निधन के बाद मंदिर बनकर तैयार हुआ और प्रथम राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद को शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा के लिए बुलाया गया। नेहरू का विरोध दरकिनार करते हुए राजेन्द्र प्रसाद वहां पहुंचे। यहां यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि प्रभास में जीर्ण मन्दिर स्थल के उत्खनन में मन्दिर के ध्वंस और पुनर्निर्माण की पांच परतें सामने आईं थीं और अयोध्या में रामजन्मभूमि पर उत्खनन में भी मन्दिरों के ध्वंसावशेष प्राप्त हुए हैं।
यूं हुआ पुनर्निर्माण
14 नवम्बर 1947 - सरदार पटेल ने प्रभास में मन्दिर पुनर्निर्माण की घोषणा की।
25 दिसम्बर1947 - सरदार पटेल ने जूनागढ के अधिकारियों से मन्दिर के लिए भूखण्ड आवंटित करने की प्रार्थना की।
15 मार्च 1950 - भारत सरकार और सौराष्ट्र सरकार की औपचारिक स्वीकृति के बाद सोमनाथ न्यासी मण्डल का पंजीकरण।
08 मई 1950 - नन्दी की रजत-प्रतिमा की स्थापना के साथ मन्दिर का शिलान्यास।
11 मई 1951 - राष्ट्रपति डॉ राजन्द्र प्रसाद ने शास्त्रोक्त विधि से जलाभिषेक द्वारा शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा की।
किसने क्या कहा
' मन्दिर के ध्वंसावशेषों को सुरक्षित रखने का अर्थ होगा कि उसके ध्वंस की पीड़ा को बनाए रखा जाए, वह हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र के बजाय कटुता पैदा करेगा। इसलिए अच्छा होगा कि उन ध्वंसावशेषों पर सोमनाथ मन्दिर का उसके पुराने भव्य रूप में पुनर्निर्माण किया जाए। '
- नरहरि विट्ठल गाडगिल,
केन्द्रीय मंत्रिमण्डल की बैठक में बोलते हुए

' इस मन्दिर के प्रति हिन्दू भावना बहुत प्रबल और व्यापक है। वर्तमान स्थितियों में यह सम्भव नहीं है कि मन्दिर की थोड़ी बहुत मरम्मत करके या उसी रूप में बनाए रखकर हिन्दू भावना को शान्त किया जा सके। मन्दिर में प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा हिन्दू समाज के लिए प्रतिष्ठा एवं भावना का विषय बन चुकी है। '
- 9 अगस्त 1948 को फाइल पर
सरदार पटेल की टिप्पणी

' यहां के मुसलमानों को सोमनाथ मन्दिर की पुनर्स्थापना के लिए क्यों सहयोग नहीं करना चाहिए और उस बारे में उन्हें क्यों गर्व नहीं होना चाहिए? महमूद गजनवी ने जो हीन, जंगली और असंस्कृत कृत्य किये , क्या उसके बारे में यहां के मुस्लिमों को गर्व का अनुभव होता है? ऐसा है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। उनके लिये भी यह हानिकारक है। '
- उर्दू पत्रिका में छपे एक लेख से दुखी होकर प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी

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