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वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया विश्‍व के अग्रजों ने

वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया विश्‍व के अग्रजों ने
24 Aug

वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश दिया विश्‍व के अग्रजों ने

ईसाईयत का उदय आज से दो हजार साल पहले हुआ। इसके पहले पश्‍चिमी एशिया में पारसी और यहूदी थे। इन सेमेटिक मज़हबों के पहले विश्‍व में अनेक उपासना-पद्धतियाँ थीं। यूरोप में अग्नि-पूजक थे, उत्तरी और दक्षिणी अमरीका में माया और इंका लोग भी प्रकृति की विविध रूपों में पूजा करते थे। अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड आदि में भी कई मज़हब फले-फूले। ईसाई पंथ के प्रचारकों ने बर्बरता से इन प्राचीन सभ्यताओं और सम्प्रदायों का विनाश किया। फिर भी ऐसे सभी देशों में मूल-सिद्धान्तों और पंथों को मानने वालों का एक समूह बना रहा। ऐसे समूहों को ईसाई पादरी जंगली, आदिवासी और रेड-इंडियन जैसे नाम दे कर दुत्कारते रहे, फिर भी बड़ी संख्या के इन समूहों ने अपनी मूल संस्कृति को बचाये रखा। ये सभी संस्कृतियाँ हिन्दू धर्म और संस्कृति से प्रभावित थीं।
विश्‍व अग्रज परिषद्
कुछ सालों पहले अमरीका स्थित ‘अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र’ (आई सी सी एस) ने ऐसी सभी प्राचीन संस्कृतियों को एक मंच पर लाने का काम शुरु किया। प्राचीन उपासना-पद्धतियों को मानने वालों को एल्डर्स याने अग्रज कहा गया और एक ‘विश्‍व अग्रज परिषद’ (वर्ल्ड कौंसिल ऑफ एल्डर्स ऑफ एंशिएंट ट्रेडिशन्स एण्ड कल्चर्स) का गठन किया गया। वास्तव में ये आज की दुनिया के अग्रज ही है। अनेक देशों की प्राचीन परम्पराओं और संस्कृतियों को मानने वाले समूह इस परिषद के सदस्य हैं। ये सभी प्राचीन मान्यतायें प्रकृति की उपासना से जुड़ी हैं और प्रकृति की गोद में बैठ कर मानव-जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करती हैं। इन सभी प्राचीन सभ्यताओं में आज भी विश्‍व को शांति और सद्भाव सिखाने की कूवत है। पूरी दुनिया इस समय जिहाद, आतंकवाद और कट्टरता की चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में पचास देशों की प्राचीन संस्कृतियों के ध्वज-वाहक शांति और विश्‍व-बन्धुत्व का संदेश दे रहे हैं।
विश्‍व अग्रज परिषद (वर्ल्ड एल्डर्स कान्फ्रेंस) के अब तक पाँच अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हो चुके हैं। पाँचवाँ सम्मेलन गत 1 से 4 फरवरी तक मैसूर के गणपति सच्चिदानन्द आश्रम में हुआ। इसमें दुनिया के चालीस देशों की 73 प्राचीन संस्कृतियों को मानने वाले लगभग तीन सौ अग्रजों ने भाग लिया। आस्ट्रेलिया,न्यूजीलैण्ड, लाटिविया,स्लोवेनिया, हंगरी, ब्राजील, अमरीका, मैक्सिको, केन्या आदि देशों के अग्रज पारम्परिक वेश में इन सम्मेलन में सहभागी हुए। सरसंघचालक श्री मोहन राव भागवत ने इस सम्मेलन का उद्घाटन किया। संघ के कई प्रमुख कार्यकर्ताओं तथा अन्यान्य देशों में कार्यरत भारतीय संस्कृति-दूतों सहित कई पूजनीय संत एवं धर्माचार्य भी सम्मेलन में थे। उद्घाटन से पहले चालीस देशों के अग्रजों की विविध वेश-भूषाओं में निकली शोभायात्रा आकर्षण का केन्द्र रही। चार दिनों के विचार मंथन के बाद अग्रजों ने एक घोषणा-पत्र जारी किया। इस्लामिक स्टेट के बर्बर अत्याचारों के शिकार यजीदियों के एक प्रतिनिधि मंडल ने सरसंघचालक से मिल कर अपनी करुण गाथा भी सुनाई ।
वेद-मंत्रों का उद्घोष
सम्मेलन का शुभारम्भ वेदों की प्रसिद्ध ॠचा ‘सं गच्छद्वम् संवदभ्वम् सं वो मनासि...’ से हुआ। अपने सम्बोधन में भागवत जी ने कहा कि विभिन्न परम्पराएं अलग अलग भले ही दिखती हों, लेकिन सार-रूप में सब एक ही हैं। संसार अनेक चीजों से मिल कर बना है और वे सब एक दूसरे से जुड़ी हैं। इस सृष्टि में हर वस्तु दूसरी वस्तु पर प्रभाव डालती है। उन्होंने कहा कि हमारे प्राचीन विचारकों ने इसीलिये कहा कि आधुनिक विज्ञान जो भी खोज करेगा वह कहीं न कहीं प्राचीन परम्परा से अवश्य जुड़ी होगी।
सच्चिदानंद आश्रम के प्रमुख पूज्य गणपति सच्चिदानंद स्वामी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा, कि एक साथ इतने देशों के लोगों को देख कर आनंद का अनुभव हो रहा है। हमें एक दूसरे की परम्पराओं और संस्कृति को जानने का प्रयास करना चाहिये। माया सभ्यता की अग्रज एलिजाबेथ अर्जानों (ग्वाटेमाला) ने कहा कि वे अग्रजों के सभी सम्मेलनों में सहभागी हुई हैं और इससे उन्हें एक नई दृष्टि मिली है। न्यूयार्क स्थित अं.सो.अ.केन्द्र (आई सी सी एस) के अध्यक्ष शेखर पटेल ने स्वागत भाषण किया। लिथुआनिया के अग्रज श्री इनिजा त्रिकंनियने ने भी उद्घाटन-सत्र में अपनी बात रखी।
समापन-सत्र में सहसरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबोले ने चालीस देशों से आये अग्रजों को सम्बोधित किया। उन्होंने कहा, कि विश्‍व के कल्याण के लिये सब देशों को यह अनुभव करना चाहिये कि हम सभी एक ही परिवार के सदस्य हैं।
वसुधैव कुटुम्बकम् की घोषणा
चार दिनों के सम्मेलन के समापन के समय दुनिया के ‘अग्रजों’ ने घोषणा-पत्र जारी किया, जिसमें कहा गया कि पूरा विश्‍व-समुदाय एक परिवार है और अग्रज परिषद् इसी दिशा में प्रयास करेगी।
घोषणा-पत्र की कुछ प्रमुख प्रतिज्ञायें इस प्रकार हैंः-
-दुनिया के विनाश की कोशिश करने वाली हिंसक ताकतों को रोकने का हम भरसक प्रयत्न करेंगे।
- हम प्रतिज्ञा करते हैं कि ‘सभी मार्ग एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं’ के सिद्धान्त का अनादर नहीं करेंगे। अन्यों को भी इसका अनादर न करने के लिए मनायेंगे।
- विभिन्न समुदायों के बीच पनप रहे अलगाव को समाप्त करने में हम पूरी शक्ति लगायेंगे।
- परस्पर सौहार्द्र और सामंजस्य के साथ रहने की भावना बढ़ाने के लिये हम प्रयासरत रहेंगे।
गुलाबी नगर में विश्‍व के अग्रज
एल्डर्स का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन मुम्बई में 2003 में हुआ था। उसके पहले सभी देशों के अग्रज जयपुर-भ्रमण के लिये आये थे। 30 जनवरी 2003 को जयपुर के लक्ष्मी निवास होटल के सभागार में नागरिक अभिनन्दन किया गया। उस समय त्रिनिदाद के बाबा लोरिस ने स्वस्ति-वाचन किया। सभी अग्रजों ने हाथ जोड़ कर जयपुर के निवासियों के स्वागत का उत्तर दिया था। उस समय अग्रजों ने कहा कि भारत का ‘विविधता में एकता का सूत्र ही विश्‍व में शांति स्थापित कर सकता है।’
इसके तीन वर्ष बाद 2006 में ‘अग्रज परिषद’ का दूसरा अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। तत्कालीन सरसंघचालक सुदर्शन जी ने इसका उद्घाटन किया था। o
अग्रजों ने कहा
- यजीदी प्रतिनिधिमण्डल हम 15 लोगों का था। हम अपनी प्राचीन संस्कृति को बचाने तथा इस्लामिक स्टेट के जिहादियेां से रक्षा का प्रयत्न कर रहे हैं। सम्मेलन में हमको नई ऊर्जा मिली है।
-दखेश खुदेदा तथा हूशाम मिलहिम (ईराक),
लैला खुदेदा (अमरीका)
- अनेक संस्कृतियों व परम्पराओं को समझने में मुझे इस सम्मेलन में सफलता मिली है। एक महत्वपूर्ण सीख मुझे यह मिली है कि यदि हम अन्य लोगों को आत्मीय समझेंगे तो सामंजस्य के द्वार अपने आप खुल जायेंगे।
-मारा जुकूरे (लाटविया)
- मेरे परिवार के सभी लोग उपनिषद गीता तथा अन्य हिन्दू धर्म-ग्रन्थों से बहुत प्रभावित हुए हैं। हम सभी ध्यान करते हैं, पूजा करते हैं तथा अन्य धार्मिक आचारों का पालन करते हैं।
-केटी कैली (अमरीका)
- हम अग्नि की पूजा करते हैं तथा इसे ‘उगनिस’ कहते हैं। भारत हमारी मातृभूमि है। हमारे पुरखे बिहार से हंगरी आये थे।
-हंगरी के एक अग्रज
- भारत हमारी दूसरी माँ है। भारतवासी और हम भाई-बहिन हैं। हम प्रतिदिन गायत्री मंत्र का पाठ करते हैं।
-स्लोवेनिया के एक अग्रज
- पश्‍चिम आर्थिक दृष्टि से चाहे कहीं आगे हो परन्तु मानवीय मूल्यों तथा आध्यात्मिक दृष्टि से वह अत्यंत पिछड़ा है। भारतीय संस्कृति की विविधता ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध बनाया है।
-फे्रड्रिक लेमोण्ड (आस्ट्रिया)

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