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राज्याभिषेक के हजार वर्ष पूरे

राज्याभिषेक के हजार वर्ष पूरे
24 Aug

राज्याभिषेक के हजार वर्ष पूरे

दुनिया के महान विजेताओं में थे राजेन्द्र चोल

कृण्वन्तो विश्‍वमार्यम् तथा स्वदेशो भुवनत्रयम्-अर्थात् समूचे विश्‍व को आर्य याने श्रेष्ठ बनायेंगे और तीनों लोक अपना ही देश हैं, ये मंत्र प्रारम्भ से ही भारतवासियों को पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देते रहे। सारी दुनिया को श्रेष्ठ बनाने के उद्देश्य से हमारे देश-बान्धव सहस्रों वर्षों तक विश्‍व के देशों में जाते रहे और वहाँ ‘हिन्दू संस्कृति’का जन-कल्याण का संदेश देते रहे। इनमें से कुछ श्रेष्ठ पुरुष ऐसे थे जिन्होंने प्रयत्नों की पराकाष्ठा कर दी और भारतीय संस्कृति का अमिट प्रभाव दुनिया पर छोड़ा।

ऐसे पहले भारतीय के रूप में महर्षि अगस्त्यहमारे सामने आते हैं। अगस्त्य मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के समकालीन थे। उन्होंने रामायण -काल में समुद्री नौकाओं से महासागर पार करते हुए दक्षिण पूर्व एशिया के देशों की खोज की। अगस्त्य के समुद्र पी लेने की कथा इसी तथ्य का रूपक है कि उन्होंने महासागर पार किये और अनेक नए स्थानों की खोज की। दुनिया के इतिहास में नये-नये देशों पर पैर रखने वालों में सबसे पहला नाम अगस्त्य का ही है।
इसी प्रकार महाभारत काल से कुछ पहले कन्बु स्वयम्भुव नाम का एक ब्राह्मण योद्धा अपने साथियों के साथ एक विशालकाय नौका में सवार हो आज के कम्बोदिया में पहुँचा। उसी के नाम से इस भू-प्रदेश का नाम कम्बुज और फिर कम्पूचिया हो गया। आज से दो हजार साल पहले कौण्डिय नाम का एक और ब्राह्मण योद्धा भारत के दक्षिणी भू-भाग से महासागर पार कर कम्बुज पहुँचा। उसने वहाँ की राजकुमारी से विवाह कर एक सामर्थ्यशाली राजवंश की नींव डाली। कम्पूचिया, वियतनाम, थाईलैण्ड, म्यांमार, लाओस, मलेशिया, इंदोनेशिया,जावा, सुमात्रा का जो क्षेत्र है उस पर कौण्डिय का शासनाधिकार हो गया और हिन्दू-संस्कृति का प्रवाह वहाँ बहने लगा।
इन्हीं दिग्विजयी पुरुषार्थी और पराक्रमी पुरुषों में एक चोल वंश के राजेन्द्र देव भी थे। इनके राज्याभिषेक के एक हजार साल पूरे होने के समारेाह गत वर्ष अर्थात् 2014 से प्रारम्भ हो गये हैं। यह अत्यंत गौरव का विषय है कि उक्त चारों दिग्विजयी महापुरुष अगस्त्य, कम्बु, कौण्डिय और राजेन्द्र चोल भारत के दक्षिणी भू-भाग के ही थे। महर्षि अगस्त्य अपनी युवावस्था में ही विध्यांचल को पार कर दक्षिण में चले गये थे।
चोल राजवंश- सातवाहनों के निर्बल होने के बाद आज से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले दक्षिण भारत में पल्लवों और पाण्ड्यों का प्रभुत्व हो गया। चोल राजवंश उन दिनों पल्लवों के अधीन था तथा वर्तमान कुडप्पा जिले (तमिलनाडु) के क्षेत्र पर उनका शासन था। नवीं शताब्दी के अंत में चोलों की शक्ति कुछ बढ़ने लगी। पल्लवों और पाण्ड्यों के बीच चल रहे संघर्ष में दोनों कमजोर हो रहे थे और इसका लाभ उठा कर चोल शक्तिशाली हो रहे थे। विजयालय नाम के चोल राजा ने अपनी स्थिति मजबूत की और उसके पुत्र आदित्य ने अपना स्वतंत्र चोल राज्य स्थापित कर दिया। आदित्य का पौत्र राजराज सन् 985 में चोल-वंश का पहला प्रतापी नरेश बना। राजराज चोल ने पहले तो पाण्ड्य राज और केरल के राजा को परास्त किया और फिर पश्‍चिमी गंगदेश (आज का आंध्र) को हरा कर पूरे दक्षिण भारत में अपनी सत्ता सुदृढ की।
इसके बाद उसने शक्तिशाली नौसेना से सिंहल द्वीप (श्रीलंका) का उत्तरी भाग जीत लिया।
तेजस्वी राजेन्द्र चोल-अपने पिता राजराज के निधन के बाद 1014 में राजेन्द्र देव ने चोल साम्राज्य की बागडोर हाथ में ली। वह एक दूरदर्शी शासक था। एक शक्ति-सम्पन्न भारत की आवश्यकता उसे दिखाई पड़ रही थी, क्योंकि उत्तर भारत में महमूद गजनवी के आक्रमण प्रारम्भ हो चुके थे। इसके लिए उसने चोल साम्राज्य का विस्तार कर दक्षिणापथ को सैनिक दृष्टि से सुदृढ़ करने का काम शुरू किया। दूसरा काम उसने राज्य को आर्थिक दृष्टि से मजबूत करने का किया।
आज के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश तक तो चोल साम्राज्य बढ़ ही चुका था, अब राजेन्द्र चोल ने कलिंग (उड़ीसा) और बंगाल की विजय-यात्रा शुरू की। दोनों ही राज्यों ने राजेन्द्र की अधीनता स्वीकार कर ली। दक्षिण में उसने सिंहल द्वीप (श्रीलंका) को पूरी तरह जीत कर भारत की दक्षिणी सीमा को पूरी तरह निरापद कर लिया। उसकी नौसेना अब तीनों सागरों (हिन्दू, सिन्धु और गंगासागर) में स्वच्छंदता से विचरण करने लगी।
आर्थिक मजबूती के लिये चोल-राज ने अन्य देशों से व्यापार को बढ़ावा देने का निश्‍चय किया। उस समय चीन-जापान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से भारत का अधिकतर लेन-देन होता था। बहुमूल्य सामग्री से लदे जहाज गंगासागर (बंगाल की खाड़ी) और हिन्द महासागर को पार कर यव द्वीप (जावा) होते हुए लव-द्वीप (लाओस), चम्पा(वियतनाम), कम्बुज (कप्पूचिया) के बन्दरगाहों पर माल उतारते थे। इसके बाद ये पोत चीन और जापान की ओर बढ़ जाते थे। इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिये राजेन्द्र देव ने अपनी नौसेना को और मजबूत किया और लड़ाकू जहाजों पर सवार हो निकल पड़ा महासागरों को नापने के लिये।
अद्वितीय अभियान- प्रख्यात इतिहासकार डा. रमेश चन्द्र मजूमदार ने राजेन्द्र चोल के इस अभियान को अद्वितीय बताते हुए लिखा है-“यह बहुत बड़ा नौसैनिक अभियान था जिसकी योजना अभूतपूर्व थी। इतना बड़ा नौसैनिक अभियान प्राचीन भारत में न तो उसके पूर्व कभी हुआ था और न इसके बाद ही कभी हुआ।” इस अभियान का उद्देश्य अन्य देशों से भारत के व्यापार के मार्ग को सुरक्षित करने के साथ ही वैदिक धर्म की विजय-ध्वजा एक बार फिर से पूरे एशिया में फहराना था। दक्षिण-पूर्व एशिया के तत्कालीन श्रीविजय साम्राज्य के साथ चोल राजवंश के मित्रता के सम्बन्ध थे, लेकिन वहाँ के सैनिकों ने भारत से माल लेकर आई कई नौकाओं को लूट लिया था। उसका दण्ड देने के लिये राजेन्द्र देव ने यह नौसैनिक अभियान प्रारम्भ किया।
सन् 1025 में उसके सैनिक बेड़े ने फुर्ती से गंगा सागर पार कर यव-द्वीप (जावा) और सुवर्ण द्वीप(सुमात्रा) पर अधिकार कर लिया। श्रीविजय साम्राज्य के अधिपति उस समय संग्राम विजयतुंगवर्मन थे। उसकी नौसेना भी काफी शक्तिशाली थी। राजेन्द्र देव ने सम्राट को मित्रता का संदेश भेजा, लेकिन उसने युद्ध करने का निश्‍चय किया। चोल सेना ने मलय प्रायद्वीप (मलेशिया) पर आक्रमण कर श्रीविजय के प्रमुख बन्दरगाह कडारम् (केडाह) को जीत लिया। अब दोनों सम्राटों का निर्णायक युद्ध हुआ जिसमें चोल नौसेना के लड़ाकू युद्ध-पोतों ने श्रीविजय राज्य की नौ-सेना को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इस पराजय के पश्‍चात विजयतुंगवर्मन ने चोल सम्राट से मित्रता कर ली।
भारत का व्यापार मार्ग अब पूरी तरह सुरक्षित हो गया था। इसी के साथ संम्पूर्ण दक्षिण भारत और सिंहल द्वीप के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया पर भी चोल साम्राज्य की विजय पताका फहराने लगी। अन्दमान-निकोबार द्वीपों और मालदीव पर भी चोल-नौसेना का अधिपत्य हो गया। राजेन्द्र चोल की इस विजय के शिलालेख आज भी मलेशिया, इंदोनेशिया और सुमात्रा में मिलते हैं।
उत्तम शासन व्यवस्था- राजेन्द्र चोल निस्संदेह रूप से विश्‍व के महान् विजेताओं में से था। लेकिन उसकी महानता उसके शौर्य, पराक्रम और सामर्थ्य में ही नहीं थी, उसने अनेक जन-कल्याणकारी कार्य भी किये। उसके शासन काल में पूरे दक्षिणापथ की जनता सुखी और समृद्ध थी। हालैण्ड के चार सौ साल प्राचीन लिडेन विश्‍वविद्यालय के म्यूजियम में राजेन्द्र देव के सुशासन और विजय यात्राओं के दस्तावेज शिला-लेखों के रूप में उपलब्ध हैं। राजाधिराज राजेन्द्र के आज्ञापत्र 21 ताम्र-पत्रों में मौजूद हैं जिनका भार तीस किलोग्राम है। ये आज्ञापत्र संस्कृत और तमिल में हैं।
चोल साम्राज्य प्रशासन की दृष्टि से 6 प्रान्तों में बँटा हुआ था। ये प्रांत ‘चोल मण्डल’ कहलाते थे। प्रत्येक चोल-मण्डल में कई सम्भाग थे, जिन्हें ‘कोट्टम’ कहा जाता था। कोट्टम में नाडु (जिले) थे और जिलों में ग्राम-समूह थे जो कुर्रम नाम से जाने जाते थे। सबसे छोटी इकाई ग्राम थे। प्रत्येक इकाई अपना शासन खुद चलाती थी। इस तरह पूर्ण रूप से विक्रेन्द्रित शासन व्यवस्था चोल साम्राज्य में थी।
सुदूर दक्षिण से गंगा के मैदानों तक राज्य की सीमा हो जाने के कारण गंगेकौण्ड की उपाधि धारण कर राजेन्द्र चोल ने अपनी नई राजधानी बनाई। ‘गंगेकौण्ड चोलपुरम’ इस राजधानी का नाम था। वर्तमान में तमिलनाडु के त्रिची जिले के ‘गंगकुंडपुरम्’ में इस प्राचीन विशाल नगरी के भग्नावशेष हैं।
कला एवं संस्कृति का उत्थान-साहित्य, कला, स्थापत्य कला, शिक्षा आदि के क्षेत्र में राजेन्द्र देव के समय उल्लेखनीय विकास हुआ। वैदिक संस्कृति की शिक्षा के लिये प्रत्येक कुर्रम में श्रेष्ठ गुरुकुल उस काल में स्थापित किये गये। इनमें संस्कृत और तमिल में शिक्षा दी जाती थी। उत्कृष्ट साहित्य की रचना भी इन दोनों भाषाओं में उस समय हुई। स्थापत्य, मूर्ति कला और मंदिरों के निर्माण के लिये यह भारत का स्वर्ण-युग था। श्रीरंगम्, मदुरा, कुंभकोणम्, रामेश्‍वरम आदि प्रसिद्ध स्थलों पर राजेन्द्र देव ने भव्य मंदिर बनवाये। ये आज भी हैं और स्थापत्य कला के अद्वितीय उदाहरण माने जाते हैं। इनकी दीवारों, गोपुर, गर्भगृह आदि में उकेरी गई मूर्तियाँ भारतीय मूर्ति-कला की उत्कृष्टता का बखान करती हैं।
चोल सम्राट राजेन्द्र देव स्वयं शैव थे, किन्तु भगवान विष्णु तथा गौतम बुद्ध के अनेक मन्दिर उन्होंने बनवाये। प्रत्येक पंथ और सम्प्रदाय को राज्य से प्रश्रय मिलता था और उपासना पद्धति की सम्पूर्ण स्वतंत्रता चोल-राज्य में थी। अपनी नई राजधानी में चोल-राज ने एक विशाल झील बनवाई जिसका तटबंध 25 कि.मी.लम्बा था। उस झील में बंगाल से गंगा का जल लाकर डाला गया।
देखा जाये तो राजेन्द्र चोल की विजय-यात्राओं के सामने सिकन्दर तथा नेपोलियन के सैनिक अभियान भी बौने थे। इसलिये कि यूरोप के दोनों सेनानायक केवल युद्धों में ही उलझे रहे, अपने राज्य में सुशासन और जनता की सुख-समृद्धि की ओर वे ध्यान ही नहीं दे पाये। उनके सैनिक अभियान भी राजेन्द्र चोल जैसे विस्तृत नहीं थे और उनकी सैनिक-विजयें भी स्थाई नहीं रह सकीं। दोनों ही महानायक बुरी मौत मरे, जबकि राज राजेन्द्र चोल ने बीस वर्षों के यशस्वी शासन के बाद अपने पुत्र राजाधिराज को एक विस्तृत और शक्तिशाली साम्राज्य का दायित्व सौंपा।

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