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मिताकुये ओयासिन

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मिताकुये ओयासिन
24 Aug

मिताकुये ओयासिन

‘मिताकुये ओयासिन’ मूल अमरीकियों की एक कहावत है। इसका अर्थ है- हम सब आपस में जुड़े हैं। कितना अंतर है अमरीका के मूल निवासियों और वर्तमान निवासियों की सोच में। ईसाईयत केवल ईसा को मानने वालों को जुड़ा हुआ और शेष को पापी या नर्कगामी मानती है, जब कि ईसाईयत से पहले के अमरीकी पूरी दुनिया को बन्धु मानते हैं। आश्‍चर्य यह है, कि इतने बड़े सोच वालों को अमरीका में आदि-वासी या गँवार माना जाता है, जबकि संकुचित दृष्टिकोण वाले लोगों को आधुनिक और प्रगतिशील कहा जाता है। केवल अमरीका ही नहीं, यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया आदि में भी ईसाइयत के पहले के समाजों को ‘पेगन’,पिछड़ा या आदिवासी माना जाता है। इन पेगन, प्रकृतिपूजक या यूरोप के आदिवासियों का जीवन-दर्शन अत्यंत उच्च कोटि का है। अमरीका में सांस्कृतिक अध्ययन का अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र (International Centre for Cultural Studies) स्थित है। इस केन्द्र ने विश्‍व के 40 देशों की 75 प्राचीन संस्कृतियों का एक मंच बनाया है और उसे प्राचीन परम्पराओं और संस्कृतियों के अग्रजों की विश्‍व-परिषद संक्षिप्त में-विश्‍व अग्रज परिषद (वर्ल्ड एल्डर्स कान्फ्रेंस)नाम दिया है।
इन प्राचीन संस्कृतियों में कई समानतायें हैं और सभी भारतीय संस्कृति से मिलती-जुलती हैं। अमरीका स्थित उक्त अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र की एक इकाई नागपुर में भी है। इसके प्रमुख डा.यशवंत पाठक ने दुनिया भर की प्राचीन व मूल संस्कृतियों पर शोध-कार्य किया है। उनकी शोध के परिणाम बड़े आश्‍चर्यजनक हैं। अफ्रीका के मसाई,किकूयू,जूलू, जोसा व अन्य समूह; अमरीका के इंका, माया, लकोटा डकोटा, होपी तथा कैरिब समूहों; यूरोप के पेगन, न्यूजीलैण्ड के मबारी तथा आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के अध्ययन से निष्कर्ष प्राप्त हुआ हैं कि इन सभी की मान्यताएं भारतीय मान्यताओं से अद्भुत साम्य लिये हुए हैं।
एक बार हाउस्टन (अमरीका) में माया-समूह के एक बुजुर्ग लोगों के प्रश्‍नों का उत्तर दे रहे थे। किसी ने पूछा कि इतने प्रकार के प्रश्‍नों के आप इतने तर्क-संगत उत्तर दे रहे हैं , इसका क्या रहस्य है? अमरीका की ‘माया’ सभ्यता के बुजुर्गवार ने उत्तर दिया- “ मेरे उत्तर तर्क संगत इसलिये हैं कि मैं प्रश्‍नों का उत्तर नहीं दे रहा।” उनका अर्थ था कि उनके भीतर का परमात्मा प्रश्‍नों का उत्तर दे रहा है।
सभी प्राचीन संस्कृतियाँ आज भी आत्मा के अस्तित्व को मानती हैं। अफ्रीका का जूलू कबीला काफी प्रसिद्ध है। इस कबीले में संतों को ‘इसानुसिस’ कहा जाता है। यह शब्द निश्‍चित रूप से ‘संन्यासी’का ही दूसरा रूप है। जूलू लोगों के इसानुसिस के अनुसार ‘इधालोजी’(आत्मा) भौतिक शरीर में निवास करती है। इसको वे ‘इटोंगो’ (परमात्मा) का स्वरूप मानते हैं। जूलू मान्यता के अनुसार कई जन्मों के और उन जन्मों की साधना के बाद इधोलोजी (आत्मा) इटोंगो(परमात्मा) में उसी प्रकार लीन हो जाती है जैसे एक बूंद समुद्र में होती है। जूलू कबीला तथा अन्य सभी प्राचीन संस्कृतियाँ मानती हैं, कि सभी मनुष्य उसी एक परमात्मा का
स्वरूप हैं और इसीलिये किसी भी प्राचीन सम्प्रदाय में ईसाईयत या इस्लाम की तरह अधिक से अधिक अपने अनुयायी बनाने की अर्थात् मतान्तरण की परम्परा नहीं रही।
सभी प्राचीन संस्कृतियाँ ईश्‍वर के प्रत्येक निर्माण में दिव्यता देखती हैं। इसीलिये भारत की तरह इन पुरातन संस्कृतियों में भी एक से अधिक देवी-देवताओं का अस्तित्व है। सभी देवी-देवताओं का एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी एवं अनादि ईश्‍वर का प्रतिरूप माना जाता है। सियरा लियोन (पश्‍चिम अफ्रीका) के मेन्दे कबीले में इस सर्वशक्तिमान को ‘न्गेवो’ नाम दिया गया है। कांगो (मध्य अफ्रीका) का गोम्बे कबीला इसे एकोंगो नाम से पुकारता है। केन्या (पूर्वी अफ्रीका) के किकूकू लोग ईश्‍वर को ‘गाई’ कहते हैं।
आस्ट्रिया के फे्रड्रिक लेमोण्ड मानते हैं कि -“ अपनी आश्‍चर्यजनक विविधताओं के कारण प्रकृति पवित्र है। यदि आपको ईश्‍वर से बात करनी है तो यह आसान है। एकान्त में जाएं और ध्यान लगायें। एक समय आता है, जब आप जल-प्रवाह का संगीत समझने लगते हैं, जंगलों से गुजरती हवा का संगीत सुनने लगते हैं, पक्षियों का वार्तालाप समझने लगते हैं। ईश्‍वर से संवाद का सर्वश्रेष्ठ तरीका शान्त हो जाना है। जिस क्षण आप बात करने लगते हैं, ईश्‍वर से संवाद समाप्त हो जाता है।”
विश्‍व की प्राचीनतम संस्कृतियों की इन्हीं विशेषताओं और इनके माध्यम से दुनिया में शांति और सह-अस्तित्व की स्थापना के उद्देश्य से अग्रजों का मंच विश्‍व अग्रज परिषद बनाया गया है।.

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