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मालवीय जी को भारत-रत्न पर भी आपत्ति

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मालवीय जी को भारत-रत्न पर भी आपत्ति
24 Aug

मालवीय जी को भारत-रत्न पर भी आपत्ति

इस देश के अंग्रेजी के अधिकतर समाचार पत्र और कई दूरदर्शन चैनल घोर-हिन्दू विरोधी हैं। हिन्दू-विरोध उनकी पहचान है, उनका रेजन-डेटर याने उनके अस्तित्व का कारण है, उनका मिशन है और हिन्दू-विरोध ही उनकी रोजी-रोटी है। इसमें इनका कोई दोष भी नहीं है। इन अखबारों-चैनलों में काम करने वाले लोग, संवाददाता, सम्पादक आदि मिशन स्कूलों में पढ़े हुए हैं, जहाँ हिन्दू-विरोध इनमें कूट-कूट कर भरा गया। पश्‍चिमी संस्कारों में पलने-बढ़ने के कारण ये अपनी जड़ों से बिल्कुल ही कट गये हैं। त्रिशंकु की तरह ये आसमान में उलटे लटके हुए हैं और इसलिये हिन्दू-विरोध उनकी नियति बन गई है।
आपको याद होगा कि इंग्लैण्ड राजघराने की राजकुमारी डायना की एक दुर्घटना में हुई मृत्यु का समाचार हमारे लगभग सभी अंग्रेजी अखबारों ने मुख-पृष्ठ पर और आधे से अधिक पृष्ठ में छपा था। उसके बाद भी कई दिनों तक डायना पर अखबारों के पेज काले किये जाते रहे। उनकी बुद्धि का दिवालिया-पन उस समय, उसके पहले भी और उसके बाद भी दिखाई देता रहा है। इसके ताजा उदाहरण और भी हैं।
23 दिसम्बर को झारखण्ड और जम्मू-कश्मीर राज्यों के चुनाव परिणाम आये। जम्मू-कश्मीर में भाजपा को सबसे अधिक मत प्राप्त हुए और सीटें भी पहले से दोगुने से भी तीन अधिक मिलीं। कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति इसे काफी अच्छी सफलता मानेगा। लेकिन अंग्रेजी दैनिकों ने इस पर जोर दिया कि भाजपा को घाटी से एक भी सीट नहीं मिली। एक अंग्रेजी दैनिक ने पाठकों को जोर-शोर से यह बताया कि घाटी में भाजपा को मात्र 2.2 फीसदी वोट मिले। कई समाचार-पत्रों ने यह भी लिख दिया, कि मोदी का जादू उतार पर है।
इसी दिन सायं काल पं. मदन मोहन मालवीय तथा श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत-रत्न’ देने की घोषणा की गई। अगले दिन यह समाचार दैनिक-पत्रों में प्रकाशित हुआ। इसी के साथ अंग्रेजी के अखबारों में टीका-टिप्पणियाँ भी छपी। पंडित मालवीय जी को यह सम्मान अंग्रेजी दां लोगों को बिल्कुल ही हजम नहीं हुआ। कुछ अखबारों ने लिखा कि मरने के बाद भारत-रत्न दिया ही नहीं जाना चाहिए। एक अंग्रेजी दैनिक ने लिखा, कि मालवीय को भारत रत्न मिला है तो सैयद अहमद खान को भी मिलना चाहिये। एक ने तो साफ-साफ लिखा कि मालवीय जी हिन्दू-वादी थे और सेकुलर देश में ऐसे व्यक्ति को भारत रत्न नहीं दिया जाना चाहिये था। है न हिन्दू-विरोध की पराकाष्ठा।
मुम्बई में हुई विज्ञान कांग्रेस में फिर अंग्रेजी समाचार-पत्रों ने अपनी यूरोप-भक्ति दिखाई। कांग्रेस के उद्घाटन समारोह में केन्द्रीय विज्ञान और तकनीकी मंत्री डा.हर्षवर्द्धन ने कहा कि ‘पाइथोगोरस प्रमेय’ नाम से प्रसिद्ध गणितीय सिद्धान्त की खोज भारत में ही हुई। यह एक सचाई है। पाइथोगोरस ने काफी पहले
प्रसिद्ध गणितज्ञ बोधायन ने अपनी पाठ्य पुस्तक में इस प्रमेय को दिया है। एक और आकट्य प्रमाण भास्कराचार्य की गणित की पुस्तक लीलावती है। भास्कराचार्य भी पाइथोगोरस के पहले के हैं। उन्होंने उक्त प्रमेय पर आधारित त्रिकोणमिति के सिद्धान्त लीलावती में बताये हैं। किसी और देश के समाचार-पत्र इस उपलब्धि पर गर्व करते लेकिन भारत के अंग्रेजी और यूरोपीय मानसिकता के पत्रकार इसमें भगवाकरण देख रहे हैं और डा.हर्षवर्द्धन के कथन का मखौल उड़ा रहे हैं।

अपनी जड़ों से बिल्कुल ही कट गये हैं ये अखबार-नवीस। सचमुच ये दया के पात्र हैं।

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Tom (not verified) says:

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